Friday, January 16, 2026
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Baikunth Chaturdashi: ये है हरि से हर के मिलन का दिन, विष्णु भगवान को बेलपत्र और शिव जी को कमल चढ़ा कर होता है पूजन

Baikunth Chaturdashi

by KhabarDesk
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Baikunth Chaturdashi

Baikunth Chaturdashi : बैकुंठ चतुर्दशी इस बार 14 नवंबर को मनाई जा रही है। कार्तिक माह सम्पूर्ण रूप से भगवान विष्णु के द्वापर युग में लिये अवतार श्री कृष्ण को समर्पित है। एक बार जब ऋषि मुनियों ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की कि वह सभी उनके साथ तादात्म्य स्थापित कर आत्म तत्व के स्त्री रूप से परम पुरुष तत्व रूपी ब्रह्म के साथ सम्मिलन करना चाहते हैं। तो भगवान विष्णु ने उन्हें कहा वे गोपी रूप में जन्म लेकर पावन कार्तिक माह में यमुना के तट पर देवी कात्यायनी की पूजा करते हुये मुझे प्राप्त कर सकते हैं। मैं एक माह तक उन सभी के साथ कालिंदी तट पर रह कदम्ब वृक्ष के नीचे बांसुरी बजाकर आप सबको आत्मत्व के परमतत्व से मिलने का सुख देकर आप सभी को पूर्णता प्रदान करुंगा।

बैकुंठ चौदस :-Baikunth Chaturdashi 

बैकुंठ का अर्थ है कुंठा रहित अर्थात जहां किसी प्रकार की कुंठा या अवसाद मन में न हो ऐसा वह स्थान। कुंठा रहित व्यक्ति का मन ही आध्यात्मिक रूप से बैकुंठ है जिसमे आत्मा रूपी परमत्त का निवास है । तो फिर हम उसे यहां वहां क्यों ढूंढ़े।

एक कथा के अनुसार देवप्रबोधनी एकादशी के दिन चतुर्मास की गहन निद्रा से जागने के बाद वह पुन: संसार के पालनहार के रूप में अपना दायित्व निभाने के लिये शिव जी के पास काशी आते हैं‌। चातुर्मास संसार के दायित्व को निभाने के लिये ही विष्णु जी उन्हें अपना कार्य भार सौंपकर दैत्यराज बलि के रक्षक बन कर पाताल चले गये थे। शिव जी को कैलाश से उतर कर काशी में ही अब जब तक विष्णु जी नहीं आते इस दायित्व को निभाना था।
आज पावन काशी में दोनों का यह मिलन होता है जिसमें वह कैलाशपति को उनके दायित्व से मुक्त कर स्वयं अपना संसार के पालनहार का दायित्व संभालते हैं। आज के दिन विष्णु जी को बेलपत्र और शिव जी को कमल का फूल चढ़ा कर उनका पूजन किया जाता है। यह हरि से हर के मिलन का दिन है। इसके बाद ही विष्मु जी अपने लोक बैकुंठधाम और शिव जी कैलास की ओर गमन करते हैं।

भीष्म-पंचक:-

अर्थात वह कठिन व्रत जो देव प्रबोधिनी एकादशी से लेकर‌ कार्तिक पूर्णिमा तक रहता है। इस व्रत में कार्तिक स्नान करने वाली सभी महिलायें अन्न का परित्याग करते हुये केवल दूध और फल को ही आहार के रूप में लेकर अपने परमपुरुष ठाकुर रूपी श्रीकृष्ण से मिलने के लिये अपने तन के साथ ही मन को स्वच्छ करती उन्हें इधर उधर ढूंढ़ती है। तब कहीं जाकर कार्तिक पूर्णिमा की रात्रि को महारास मंडल में उनका श्रीकृष्ण कृष्ण के साथ नृत्य करते हुये उनका मिलन होता है। यह आत्मा का परमात्मा रूपी ब्रह्म से समागम ही उसे पूर्णता प्रदान कर जन्म मरण के बंधन से मुक्त करता है।

श्रीकृष्ण के साथ महारासमंडल में नृतय करने वाली सभी गोपियां और कोई नहीं वह ऋषि-मुनि थे जो भक्ति पथपर चल कर ही अपना मोक्ष चाहते थे आत्म तत्व का परमतत्व में लीन होना ही तो भुक्ति से मुक्ति है जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होना। स्वयं महादेव भी अपने आपको इस मोह से मुक्त नहीं कर पाये और वह एक गोपी का रूप धारण कर वहांँ आये। श्रीकृष्ण ने उन्हें पहचानने के बाद ही उनके साथ एक शर्त के साथ कि अब वह गोपीश्वर के रूप में बृज में रहेंगे उनके साथ नृत्य किया। यह शिव और विष्णु के मिलन का दिन था कार्तिक पूर्णिमा जब चंद्रदेव भी अपनी सभी सताइस नक्षत्र रूपी पत्नियों के साथ निरभ्र आकाश से इस दृश्य का अवलोकन करते हुये स्वयं भी अपनी सभी कलाओं के साथ नक्षत्र मंडल में नृत्य करते हुये उन्हें हर्षातिरेक से भर रहे थे । ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय।
उषा सक्सेना

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