Narak Chaturdashi : कार्तिक माह की चतुर्दशी को दो विरोधाभासी नामों से संबोधित किया जाता है मन में प्रश्न उठा आखिर ऐसा क्यों ? प्रत्येक शब्द का अपना एक अर्थ होता है । उसके अर्थ को समझे बिना कभी और कहीं भी उसका प्रयोग अर्थ का अनर्थ भी कर सकता है । इसलिये मैंने दोनों ही शब्दों के अर्थ को उनकी तह तक जाकर खोजा और तब उनका प्रयोग किया । कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को छोटी दीपावली के रूप में भी मनाया जाता है।
रूप चतुर्दशी:-
समुद्र मंथन के पश्चात अंत में महालक्ष्मी के स्वागत के लिये स्वयं उनका भी गृह लक्ष्मी के रूप में अपने रूप सौंदर्य को निखारकर सजना संवरना आवश्यक है। पहले घर के आस पास के वातावरण की स्वच्छता इसके पश्चात उस गंदगी से दूषित हुये स्वयं अपनी भी । गृह-स्वामिनी महिलायें ही तो बरसात और नवरात्रि के पश्चात इन दिनों घर की साफ सफाई स्वच्छता में व्यस्त रहने के कारण अपने ऊपर कभी ध्यान ही नहीं दे पाती। अत:आज का यह दिन उनको सज संवर कर महालक्ष्मी के स्वागत के लिये विशेष रूप से समर्पित है ।वह अपने रूप को विशेष प्रकार के अनुलेपन से निखार कर भली भांति पूर्ण स्नान करते हुये स्वयं भी स्वच्छ होकर सोलह श्रृंगार करते हुये तैयार हों। घर को सजाने के बाद अपने रूप को संवारने के लिये ही इसे रूप चौदस कहा जाता है ।”लीपी-पोती देहरिया और सजी संवरी बहुरिया “ही सभी को लुभाती है । इसीलिये अपने रूप को सौंदर्य प्रसाधनों से संवारने के कारण ही इसे रूप चतुर्दशी कहा जाता हैं।
नरक चौदस:
इसी प्रकार से नरक चौदस का भी अपना अलग ही अर्थ है । द्वापर युग में श्री कृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ आज के दिन नरकासुर का वध करते हुये उसकी कैद से सोलह हजार एक सौ राजकुमारियों को उसकेअत्याचारों से बंधन मुक्त किया था बाद में उन सभी को उनके परिवार वालों ने अपनाने से मना कर दिया। तब वह अबला नारियां जब आत्महत्या की ओर उन्मुख हुईं, उनको आत्महत्या के पाप से बचा कर समाज में सम्मानित जीवन जीने का अवसर प्रदान करने के लिये श्रीकृष्ण जी ने स्वयं उनसे विवाह किया । अपने इस सम्मान को प्राप्त करने की प्रसन्नता में उन सभी ने घी के दीपक जलाकर श्रीकृष्ण का स्वागत करते हुये उनसे विवाह किया । श्रीकृष्ण की आठ पत्नियां पहले ही थी अब वह सब मिला उनकी संख्या सोलह हजार एक सौ आठ हो गई। आठ प्रमुख पटरानी और सोलह हजार एक सौ रानियां अब द्वारका के राजभवन की शोभा थी इसीलिये इसे छोटी दिवाली भी कहा जाता है । आज के दिन श्री कृष्ण से विवाह के लिये नरकासुर की कैद से मुक्त हुई राजकुमारियों ने भली भांति स्नान करते हुये अपने रूप को सज संवर कर सभी प्रकार से श्रृंगार करते हुये नववधू के रूप में श्रृंगारित किया था । इसीलिए आज का यह दिन नरक चौदस से रूप चतुर्दशी के रूप में परिवर्तित हुआ ।रूप चौदस के नाम से जाना जाता है।
पौराणिक कथा :
प्राचीन पौराणिक कथा के अनुसार हिरण्याक्ष दैत्य जब अपनी शक्ति के बल पर पृथ्वी को पाताल लोक में ले गया तो सभी ऋषि मुनि और देवता भगवान विष्णु की शरण में पृथ्वी देवी की रक्षा के लिये गये । विष्णु जी तब पृथ्वी के उद्धार के लिये वाराह रूप धारण कर हिरण्याक्ष का वध कर पृथ्वी को उसके चंगुल से मुक्त कर ऊपर ले आये । उस समय पृथ्वी देवी ने उन्हें अपना पति मानते हुये उनका वरण किया जिससे नरकासुर की उत्पत्ति हुई । अब वह भूमि देवी और भगवान विष्णु का पुत्र था उसने तप करते हुये ब्रह्मा जी से अमरता का वरदान मांगा जब वह उसे नहीं मिला तो उसने कहा कि मेरे पिता जब मेरी माता के साथ आयें तभी मृत्यु उनके हाथ से हो।
श्रीकृष्ण ही विष्णु के और उनकी पत्नी सत्यभामा पृथ्वी देवी का अवतार थी ।इसीलिये सत्यभामा के साथ ही उनके सहयोग से श्रीकृष्ण नरकासुर का वध सके थे । यदि संतान आततायी और अनाचारी होकर नारी जाति पर अत्याचार करे तो स्वयं माता पिता को ही उसकी गलतियां क्षमा करने के स्थान पर दंडित कर धर्म की रक्षा करनी चाहिये । यही रहस्य इस कथा केअंतर्गत निहित है ।जिसे आज परिस्थितियों के अनुसार समझने की आवश्यकता है ।
उषा सक्सेना
डिस्क्लेमर: इस आलेख में व्यक्त विचार पूरी तरह से लेखिका के व्यक्तिगत विचार हैं। इनमें दी गई जानकारी सामान्य संदर्भ के लिए है और इसका उद्देश्य किसी धार्मिक या सांस्कृतिक मान्यता को ठेस पहुँचाना नहीं है। पाठक कृपया अपनी विवेकपूर्ण समझ और परामर्श से कार्य करें।