Nanda Navami: मार्गशीर्ष अगहन माह शुक्ल पक्ष की नवमी को नंदा नवमी के नाम से जाना जाता है । सभी को आनंदित करने वाली यह देवी पार्वती का ही एक रूप है। यह उत्तराखंड की अधिष्ठात्री देवी हैं । जो रणचंडी के रूप में दैत्यों का संहार कर देवताओं की रक्षा कर आनंदित करती है इसीलिये इन्हें नंदिनी भी कहते हैं।
नंदा देवी की पौराणिक कथा:-
एक पौराणिक कथा के अनुसार कामधेनु गाय की पुत्री का भी नाम नंदिनी है, जिसे देवताओं की ओर से वशिष्ठ मुनि को दिया गया था। इक्ष्वाकु वंश के राजा दिलीप को जब बहुत समय तक संतान नहीं हुई तो वह अपने कुलगुरु वशिष्ठ मुनि के पास आये और उनसे संतान न होने का कारण जानना चाहा।तब वशिष्ठ मुनि ने उन्हें कामधेनु के श्रापकी बात कही। एक बार महाराज दिलीप देवराज इन्द्र से मिलने स्वर्ग गये ।रास्ते में उन्हें कामधेनु गाय मिली पर उन्होंने उसे प्रणाम न कर अनदेखी करते हुये आगे बढ़ गये ।
तब कामधेनु ने इसे अपना अपमान सम उन्हें संतान न होने का श्राप देते हुये कहाकि जब तक वह उनकी पुत्री नंदिनी की सेवा कर उसे प्रसन्न नहीं करेंगे संतान नही होगी ।अत: संतान प्राप्ति केलिये नंदिनी की सेवा आवश्यक है। तब वशिष्ठ मुनि ने अपनी नंदिनी गाय को सौंपते हुये कहा कि तुम इसकी सेवा करो यह मनोवांछित वर देने वाली है इसके आशीर्वाद से ही तुम्हें पुत्र की प्राप्ति होगी। राजा दिलीप मन लगा कर गाय की सेवा करने लगे वह जहां जाती उसके साथ जाते जब वह सोती तभी राजा भी सोते और उसके जागने के पहले ही उठकर गौशाला की सफाई करते।
जंगल में उसके साथ विचरणकरते ।एक दिन राजा दिलीप की परीक्षा लेने के लिये नंदिनी शेर की गुफा में चली गई जिसे देख शेर ने उसको दबोच लिया।राजा दिलीप भी उसके पीछे गुफा मे गये और जब उन्होंने शेर को नंदिनी दबोचते देखा तो अपनी म्यान से तलवार निकाल शेर पर वार करना चाहा। किंतु उनका हाथ तलवार कु मूठ से ही चिपक कर रह गया यह देख राजा ने शेर से प्रार्थना की कि वह नंदिनी को छोड़कर उनका भक्षण कर अपनी भूख मिटा ले परंतु नंदिनी को छोड़ दे ।वह अपने गुरु के आदेश पर नंदिनी की सेवा में है । जैसे ही राजा दिलीप ने शेर के सम्मुख अपना मस्तक झुकाया वह शेर एक देवता के रूप में प्रकट होकर राजा दिलीप से कहने लगे मैं धर्म हूँ और इस समय तुम्हारी परीक्षा ले रहा था कि तुम अपने धर्म पर कितने अडिग हो तभी गुरु वशिष्ठ जी भी वहाँ आ गये और कहने लगे यह सब नंदिनी की माया है।
वह तुम्हारी परीक्षा ले रही थी। नंदिनी ने तभी देवी रूप धारण कर राजा दिलीप से कहा -“मैं तुम्हारी सेवा से प्रसन्न होकर तुम्हारी मनोकामना पूरी करते हुये तुम्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान देती हूँ। नंदिनी के आशीर्वाद सेही राजा दिलीप और उनकीमहारानी सुदक्षिणा को महाप्रतापी राजा रघुकी प्राप्ति हुई जिनके नाम पर रघुकुल की रीति चली।
उषा सक्सेना-मुंबई