Mrs Movie : सान्या मल्होत्रा की फिल्म “Mrs” की काफी चर्चा हो रही है। यह फिल्म मलयालम फिल्म “द ग्रेट इंडियन किचन” की रिमेक है । कुछ साल पहले मैंने इस मलयालम फिल्म को देखा था और देखने के बाद लिखने पर मजबूर हो गई थी। मुझे लगता है, सिर्फ भारत ही नहीं पूरी दुनिया में Gender Roles की जड़ें इतनी गहरी हैं, जो हमें अपने खांचों से निकलने नहीं देतीं।
अंशु नैथानी
कई बातें पुरुषों के लिए भी जेंडर रोल के हिसाब से लिमिटेशन बनी हुई हैं। जैसे आदमी रो नहीं सकते, कमाना पुरुष को ही पड़ेगा! तो औरतों को ही घर संभालना है, खाना बनाना है, बच्चे सभांलने हैं। यही उनकी प्राथमिकता है। दो सदी पहले भी जेंडर रोल बहुत कुछ ऐसे ही थे, अगर आपने Mrs Movie देखी है या देखने वाले हैं तो मैं आपसे कहूंगी मलयालम फिल्म “द ग्रेट इंडियन किचन” भी जरूर देखें। मेरी एक महिला मित्र ने 2021 में ही इस फिल्म देखने को कहा था। उसके इसरार पर मैंने फिल्म देखी, फिल्म ने सोचने पर मजबूर कर दिया। हमारे समाज में Patriarchy की अवधारणा किस तरह से बिना किसी शोर के पोषित होती है, यह फिल्म यही बताती है।
महिलाओं और पुरुषों के जो अलग-अलग रोल हैं वह हर काल और परिस्थिति में मौजूद रहे हैं। औरतों का जीवन चूल्हे चौके में कितनी आसानी से कट जाता है और एहसास भी नहीं होता। दुनिया की हर औरत शाम को क्या बनेगा और सुबह क्या बनाऊं इस सवाल से जूझती रहती है। लोग घर की औरतों की पाक कला की तारीफ करते हैं, 45 डिग्री की गर्मी में औरतें पसीना बहाकर खाना बनाती हैं फिर घर के सदस्य उसे AC में बैठ कर खाते हैं। सर्दी के दिनों में जब रजाई से निकलने का मन नहीं होता वह सुबह सुबह नल खोल कर बर्फ से ठंडे पानी को हाथ लगाकर चाय, नाश्ता, खाना सब बनाती रहती है। कभी-कभी उकता कर जोमैटो से ऑर्डर भी कर लेती है, लेकिन अगले दिन फिर किचन उसकी जगह है। इसमें बुराई क्या है ? सदियों से होता आया है, मर्द कहते हैं अब तो कोई काम ही नहीं रहा, मिक्सी है, ovan ,microwave है ,वाशिंग मशीन है, कितने संसाधन है।
हमारी मां तो अन्नपूर्णा थी, सिलबट्टे पर चटनी पीसती थी क्या स्वाद आता था। पिताजी दोस्तों के साथ ताश की बाजी जमाते थे, मां रसोई से तरह-तरह के गर्म नाश्ते भेजती रहती थी। कैसरोल में रोटी बनाकर नहीं रखी जाती थी, गरम गरम चूल्हे की रोटी खाते थे। मां तो साक्षात अन्नपूर्णा थी। अन्नपूर्णा का रोल औरतों के लिए इतना फिट कर दिया गया है कि उन्हें इस रोल को अपनाना नहीं पड़ता वह जन्मजात आ जाता है। फिर घर परिवार का पेट भरने का सिलसिला किचन से निकलकर घर की देखभाल, बच्चों की पढ़ाई में रम जाने का होता है। धीरे-धीरे परिवार की देखभाल छोटी कुर्बानियों से बड़े त्याग तक आ जाती है। नौकरी …फ्यूचर…. ट्रैवलिंग …हॉबी ….इस सब में कंप्रोमाइज करके खुशी मिलने लगती है। चलो परिवार तो संभल गया। जब पति कहता है मेरी बीवी ने परिवार के लिए अपनी नौकरी और कैरियर सब छोड़ दिया तो कितना गर्व होता है, दोनों को होता है! बच्चों से कहता है तुम्हारे लिए तुम्हारी टैलेंटेड मां ने सब छोड़ दिया, बेचारे बच्चे, फालतू का अपराध बोध झेलना पड़ता है। लेकिन इस सब में वह महिला महान बन जाती है । बिन मांगे महान बना दी जाती है, दूसरी औरतों को उसके उदाहरण दिए जाते हैं! लेकिन वह औरत यही सोचती है, उसे महान नहीं बनना सिर्फ इंसान बनना है, यह फिल्म देखकर यही थॉट आता है। नहीं देखी तो जरूर देखें प्राइम वीडियो पर है सबटाइटल के साथ ,द ग्रेट इंडियन किचन, Mrs Movie की ओरिजिनल फिल्म।
नोट : कुछ अपवाद हमेशा होते हैं और कई ऐसे पुरुष भी हैं जो हाउस हस्बैंड का रोल अच्छे से निभाते है। और बहुत से लोग औरतों को रसोई घर की शान नहीं समझते।