Maharishi Mahesh Yogi: एक साधारण व्यक्ति की महेश से महर्षि महेश योगी बनने की यात्रा एक अद्भुत यात्रा है। एक बीज समय पाकर कैसे वट वृक्ष बनता है, यह यात्रा यही बताती है। महर्षि महेश योगी ने योग के माध्यम से जागृति का संदेश दिया था । उन्होंने भावातीत ध्यान योग की विशेष पद्धति की खोज की जिससे उन्हें एक वैज्ञानिक के रूप में भी पहचान मिली । सत्य तो यही है कि हमारे ऋषि मुनि अपने समय के बहुत बड़े वैज्ञानिक थे । जिन्हें हम आज महर्षि महेश योगी के रूप में देख सकते हैं।
छत्तीसगढ़ के एक छोटे से गांव पांडुर्का में 12 जनवरी 1918 को श्री रामप्रसाद श्रीवास्तव के यहां एक पुत्र ने जन्म लिया। जिसका नाम रखा गया महेश प्रसाद। उनका प्रारंभिक जीवन अत्यंत ही साधारण था। हाई स्कूल की परीक्षा पास करने के पश्चात इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से भौतिकी में स्नातक किया । फिर जबलपुर की गन फैक्टरी में कुछ दिन लिपिक का कार्य किया। अपने घर से साईकिल से ही वह गन फैक्टरी आते जाते। एक दिन जब वह फैक्टरी जा रहे थे तभी रास्ते में ब्रह्मानंद सरस्वती जी के प्रवचन उन्हें सुनाई दिये और वह अपने कार्य स्थल को छोड़कर कथास्थल पर जाकर बैठ गये।
नौकरी छोड़ बन गए सन्यासी
उस कथा में इन्हें इतना आनंद आया कि उन्होंने उनका शिष्य बनने की मन में ठान ली। शंकराचार्य ब्रह्मानंद सरस्वती का शिष्य बनने के लिये वह अपनी नौकरी छोड़कर संन्यास लेने के लिये हिमालय में स्थित जोशीमठ पहुंच गये। वहाँ पर एक वर्ष तक अपने परीक्षण में रखने के बाद ब्रह्मानंद सरस्वती ने उन्हे अपना शिष्य बनाकर गुरूदीक्षा दी। बाद में उन्हीं के पास तेरह वर्ष उनके सचिव के रूप में कार्य करते हुये सनातन वैदिक संस्कृति का गहराई से अध्ययन करते हुये उसके महत्व को समझा।
दो वर्ष तक हिमालय में मौन धारण कर की तपस्या
दो वर्ष तक हिमालय में रह कर मौन व्रत धारण कर योग में भावातीत ध्यान की स्थिति को समझा । इसके बाद उन्होंने टीएम अर्थात ट्रांसेडेंटल मेडीटेशन का आंदोलन चलाकर इसका विश्वव्यापी प्रचार किया। वैदिक भावातीत ध्यान के योग का महत्व स्थापित करने से वह बहुत बड़े वैज्ञानिक बने और उन्हें महर्षि पद से सम्मानित किया गया गया। उनका कहना था कि “जीवन कि ऐसी कौन सी समस्या है जिसका समाधान नहीं हो सकता, आवश्यकता है गंभीरता पूर्वक दृढ़ता के साथ ही उसका निदान ढूंढ़ने की”।
भावातीत ध्यान योग को स्थापित किया
अपने वैदिक ज्ञान के आधार पर ही उन्होंने भावातीत ध्यान योग के द्वारा ही अपनी आत्म शक्ति को जागृत करने की योग की विशेष पद्धति का व्यापक प्रचार प्रसार किया। महर्षि महेश योगी ने वैदिक संस्थान के विश्व विद्यालय खोले और अपने शिष्यों के माध्यम से भारतीय सनातन वैदिक संस्कृति का पुनरुत्थान किया। एक साधारण व्यक्ति कैसे महान व असाधारण बन गया यह हम उनके जीवन से सीख सकते हैं। ज्ञान का बीज सभी के मन में छिपा रहता है । बस आवश्यकता होती है उसे पनपने के लिये उचित हवा, धूप, पानी की जिसे पाते ही वह अंकुरित हो वटवृक्ष बन जाता है। महर्षि महेश योगी राम के सबसे बड़े भक्त थे और उन्होंने राम नाम की मुद्रा प्रचलन में चलाई जिसे आज भी नीदरलैंड द्वारा मान्यता प्राप्त है।
महर्षि महेश योगी का लक्ष्य :- एक आदर्श समाज की स्थापना था।
अपने इस लक्ष्य के लिये ही निरंतर कार्य रत रहकर उन्होंने देश भर में वैदिक विश्वविद्यालयों की स्थापना की। जिसका उद्देश्य पूर्ण शिक्षा देना है। जंहा सभी विषयों का पूर्ण ज्ञान मिले। महर्षि महेश योगी का निधन 5 फरवरी 2008 को हुआ। महर्षि महेश योगी ने शंकराचार्य की मौजूदगी में रामेश्वरम में 10 हजार बाल ब्रह्मचारियों को आध्यात्मिक योग और साधना की दीक्षा दी थी। महर्षि महेश योगी द्वारा चलाये गए आंदोलन की उस समय ज्यादा चर्चा हुई जब रॉक ग्रुप ‘बीटल्स’ ने 1968 में उनके आश्रम का दौरा किया। इसके बाद उनका का ट्रेसडेंशल मेडिटेशन अर्थात भावातीत ध्यान पूरी दुनिया में लोकप्रिय हुआ। उनके शिष्यों में पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी से लेकर आध्यात्मिक गुरु दीपक चोपड़ा तक शामिल रहे। उनके अनुसार “वेद हमारे अंदर हैं, आवश्यकता है उसे जानने की” । भावातीत ध्यान से ही वेद की ऋचाओं का जागरण हमारे अंतस् में होगा। जिसने अपने आपको जान लिया उसे फिर कुछ और जानने की आवश्यकता नहीं, कहीं भटकने की आवश्यकता नहीं।
ऊषा सक्सेना-