Holashtak : प्रतिवर्ष फागुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी से होलाष्टक प्रारंभ हो जाता है। होलिका के यह आठ दिन बहुत ही खास होते हैं। होलिका दहन के बाद ही होलाष्टक समाप्त होता है। साधारण शब्दों में यदि बोला जाए तो यह आठ दिन किसी भी मांगलिक कार्य के लिए शुभ नहीं माने जाते हैं। होलाष्टक के अगले दिन यानी चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के दिन होली खेली जाती है। आईए जानते हैं की होलाष्टक क्यों और कब मनाया जाता है।
कब मनाया जाता है होलाष्टक :
रंग और खुशियों का त्योहार होली फाल्गुन मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। रंगों और खुशियों से भरा यह त्यौहार बच्चों और युवाओं से लेकर सभी आयु वर्ग के लोगों को उत्साह और उल्लास से भर देता है। होली के शुभ अवसर पर घरों में स्वादिष्ट व्यंजन बनाए जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस दिन सभी लोग एक दूसरे से गले मिलकर पुराने शिकवे भूल कर नई दोस्ती और नये रिश्तों की शुरुआत करते हैं। रंग भरे त्यौहार होली के 8 दिन पूर्व होलाष्टक लग जाता है। इन आठ दिनों में ग्रहों की स्थिति लगभग बदली सी रहती है। जिसकी वजह से कोई भी शुभ कार्य करना वर्जित माना जाता है। इस बार होलाष्टक का प्रारंभ 7 मार्च 2025 से हो रहा है जिसका समापन 13 मार्च को होलिका दहन के बाद होगा। इसके बाद फागुन मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के दिन यानी की 14 मार्च को को होली खेली जाएगी ।
क्या होता है होलाष्टक :
हिंदू धर्म में मान्यताओं के अनुसार होलाष्टक के समय सभी मांगलिक कार्य वर्जित होते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस समय नकारात्मक ऊर्जाओं का प्रभाव काफी बढ़ जाता है। जिसकी वजह से मांगलिक कार्य करने में कई प्रकार की मुश्किलों या दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। होलाष्टक के आठ दिनों में विवाह मुंडन या गृह प्रवेश आदि सभी कार्य वर्जित होते हैं। ज्योतिषियों की माने तो अष्टमी तिथि के दिन चंद्रमा, नवमी के दिन सूर्य देव ,दशमी के दिन शनि महाराज, एकादशी तिथि के दिन शुक्र देव, द्वादशी तिथि के दिन देव गुरु बृहस्पति, त्रयोदशी के दिन बुध ग्रह, चतुर्दशी के दिन मंगल और पूर्णिमा के दिन राहु क्रूर हो जाते हैं। इन ग्रह स्थिति की वजह से किसी प्रकार की नई वस्तु की खरीदारी नहीं की जाती है। किसी भी प्रकार के मांगलिक कार्य नहीं किए जाते हैं। होलाष्टक के पहले दिन होलिका दहन वाली जगह पर साफ सफाई करके गोबर इत्यादि से लिपाई करके होली का डंडा गड़ा जाता है। जो होलिका और प्रहलाद के प्रतीक माने जाते हैं। होली जलने के बाद इसे निकाल लिया जाता है।
होलाष्टक के दौरान क्या नहीं करना चाहिए:
1) होलाष्टक के समय ब्रह्मचर्य का पालन करने की सलाह दी जाती है।
2)इस समय ज्यादा से ज्यादा पूजा पाठ और मंत्रो का जाप करना चाहिए। इस दौरान भगवान विष्णु की पूजा भी करनी चाहिए।
3)इस दौरान बालों और नाखूनों को काटने से बचना चाहिए। यदि आवश्यकता पड़ती भी है तो इनको किसी कागज में लपेट करके अलग से फेंकना चाहिए।
4) मान्यताओं के अनुसार इस समय किसी भी जरूरतमंद को वस्त्र और जूते चप्पल का दान करना चाहिए।
5) इस समय तामसिक भोजन का सेवन नहीं करना चाहिए। प्याज, लहसुन ,मांस मदिरा आदि का परहेज करना चाहिए।
6) घर के मंदिर को प्रतिदिन स्वच्छ करके पूजा पाठ करना चाहिए। भगवान शिव और विष्णु जी के मंत्रो का जप लगातार करना चाहिए।
7) होलाष्टक शुरू होने के साथ हिंदू धर्म के 16 संस्कार जैसे नामकरण, गृह प्रवेश, मुंडन, विवाह, कनछेदन आदि जैसे शुभ कार्य पर रोक लगा दी जाती है।
8) किसी भी नववधू को मायके में रहने की सलाह दी जाती है।
बबीता आर्या