Maa Sharda Devi: उत्तर प्रदेश के जालौन जिले और उरई के बीच में पड़ता है बैरागढ़। जालौन से जिसकी दूरी ३० किलोमीटर और उरई से 7 किलोमीटर है। बैरागढ़ में स्थित ये प्रसिद्ध प्राचीन मंदिर,ज्ञान की देवी मां शारदा के पूजन के लिए बनवाया गया था।
मां शारदा के मंदिर का इतिहास
इस मंदिर का निर्माण ११वीं सदी में चंदेल राजाओं द्वारा कराया गया था । यह मंदिर काफी पुराना है । जन श्रुतियों के आधार पर देवी शारदा माता की यह मूर्ति मंदिर के पीछे बने जल कुण्ड से स्वत: प्रकट हुई थी । माॅं शारदा की यह अष्ट भुजा मूर्ति लाल पत्थर से निर्मित है ।
मां शारदा ने राजा पृथ्वीराज को स्वप्न में दिए थे दर्शन
इसके विषय में कहा जाता है कि मां शारदा ने पृथ्वी राज को स्वप्न में आदेश दिया था की तुम मुझे यहां से निकालो। पृथ्वीराज सेना लेकर चल दिये उस मूर्ति को निकालने। उस समय यह क्षेत्र चंदेल राजा परमार्दिदेव के अधिकार में था जिसे परिहार वंश के राजा बसहार को युद्ध में जीत कर उनकी पुत्री मल्हना से विवाह किया था और अन्य दो पुत्रियों का विवाह अपने समय के सामंत जच्छराज और बच्छराज दोनों भाईयों से कराया था।
बसराज का बेटा माहिल राजा परमार्दिदेव से नाराज रहता था क्यों कि यह लोग राजपूत न होकर जनजातीय गौड़ वंश की घुमंतू बनाफ़र जाति के थे। जो अपनी बहादुरी और मित्रता के कारण उनके सामंत और बाद में संबंधी बन गये। मांडव की लड़ाई में वहां के राजा ने इन्हें छल से मार दिया था और इन दोनों के सिर को मांडव के प्रवेश द्वार पर विजय के रूप में टांग कर रखा था।
उस समय आल्हा की उम्र मात्र बारह वर्ष की थी और ऊदल गर्भ में थे। जब कि बछराज के दोनों बेटे मलखान और सुलखान थे। ऊदल के बड़े होने पर ही जब वह महोबा की सेना के सेना पति बने तो मांडव पर आक्रमण कर अपने पिता की हत्या का बदला लिया। मांडव की राजकुमारी से ऊदल का विवाह हुआ जिसे ऊदल ने मांडव पर विजय प्राप्त करने के बाद रास्ते में ही यह कह कर कि शत्रु की बेटी है जिसके पिता और भाई और सारे परिवार को हमने मारा है वह हमें क्षमा करके कभी हमारी नही हो पायेगी कह कर मार दिया।
कुंड से प्रकट हुई मां शारदा
मां शारदा की मूर्ति लेने इधर से पृथ्वी राज गये उधर से आल्हा ऊदल अपनी सेना के साथ आ रहे थे। उन्होंने अपने राज्य में शत्रु सेना को देख कर उन पर आक्रमण कर दिया । जब यह युद्ध हारने लगे तो आल्हा शारदा मां का भक्त होने से उनको याद कर सहायता के लिये पुकारने लगा। कहते हैं जहां भक्त वहां भगवान। मनुष्य की अपनी आत्मा में इतनी शक्ति है कि वह पत्थर को भी साक्षात् अपनी भावना के अनुरूप प्रकट होने को बाध्य कर दे।
अपने भक्त की आर्त्त पुकार सुनकर माता शारदा उस कुण्ड से स्वत:प्रकट हुईं और आल्हा को अमरता का वरदान देते हुये लड़ने के लिये अपनी सांग देकर विजय का वरदान दे कर पुन: उसी कुण्ड में समा गईं। युद्ध में पृथ्वीराज की हार हुई पुन: कुंड से उस मूर्ति को निकाला गया किंतु वह मूर्ति किसी से उठ ही नही रही थी। सब परेशान तब एक बार फिर आल्हा ने प्रार्थना की इस बार पृथ्वीराज भी अपने सपने की बात बतला कर आल्हा के साथ खड़े थे जिसके हाथ से मूर्ति उठेगी वही उसे ले जायेगा। तभी कुण्ड से आवाज आई -देवी बलि मांगती है। जो अपने प्रथम पुत्र की मुझे बलि देगा मैं उसी के हाथ से बलि लेकर उठूंगी।
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पृथ्वीराज यह सुनकर चुप चाप वापिस चले गये। आल्हा ने अपने पुत्र इंदल से शारदा मां का आदेश कहा। इंदल ने हंसते हुये कहा -पिताजी यह तन आपका मैं आपका, आपका मुझ पर पूरा अधिकार है। आपकी आज्ञा मान कर मुझे प्रसन्नता होगी। मैं देवी मां के लिये अर्पित हूं यह कहते हुये अपनी गर्दन पिता के समक्ष घुटनों के बल बैठकर नत मस्तक हो झुका दी। आल्हा ने देवी को नमन करते हुये तलवार के एक ही वार से आंख मूंद कर अपने बड़े बेटे इंदल की बलि दे दी। यह देख देवी ने आल्हा की प्रशंसा। करते हुये कहा तू मेरा सच्चा भक्त है और तेरा यह बेटा भी तुझसे कम नही उठ बेटा इंदल।
इंदल का नाम लेकर पुकारते ही वह उठ कर खड़ा हो गया जैसे कुछ हुआ ही नही। शारदा मां ने इंदल को अमरता का वरदान देते हुये कहा -अब तुम मुझे कुण्ड से निकाल कर यहां स्थापित कर दो। मैं यह कजरी वन और गांव छोड़कर कहीं नही जाऊंगी। यह मेरा आदिकाल से स्थान है समय की गति मैं इस कुण्ड में समा गई आज पुन:तुमने मुझे वापि से मेरे स्थान पर ला दिया। आज से आल्हा की देवी शारदा मां के ही नाम से प्रसिद्ध होऊंगी।
आल्हा ने मुझे रोक लिया अपनी भक्ति से पृथ्वीराज के साथ नही जाने दिया । पृथ्वीराज की हार की साक्षी मैं स्वयं हूं जिसके समक्ष अपनी भक्ति के कारण तुम जीत गये और तुमने मुझे विवश कर दिया इस पृथ्वी की धुरी के मध्य स्थापित होने के लिये। मैहर की शारदा मां और बैरागढ़ की शारदा मां दोनों ही आल्हा द्वारा पूजित है। यहां पर आल्हा के पुत्र इंदल की बलि देने और उसे भी अमरता का वरदान प्राप्त होने के कारण बेला के गौना में सभी के समाप्त हो जाने पर इंदल ने भी अपने पिता के साथ सन्यास लेकर कजरी वन की ओर प्रस्थान किया था।
दिन में तीन रूप धारण करती है देवी की मूर्ति
देवी की यह मूर्ति जो की स्वत:प्रकट मानी जाती है दिन में तीन रूप धारण करती है । प्रात:कन्या रूप कमल सा खिला हुआ मुख। मध्यान्ह पूर्ण युवती और सांझ होते ही मां का मुरझाया चेहरा वृद्धा का रूप। आसपास के क्षेत्र में मां की प्रसिद्धि। दोनों ही नवरात्रि में यहां श्रद्धालुओं की भीड़ लगती है। साथ ही मनौती के जवारे चढ़ाने सभी यहां आते हैं। माता सच्चे मन से मांगी सभी की मुरादें पूरी करती हैं।
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