Haryana Election: एक समय था जब पूरे देश में वाम दलों की अच्छी खासी राजनीतिक पैठ थी। कई राज्यों में वाम दलों की सरकारें थीं। संसद में भी वाम दलों के सांसद अच्छी संख्या में थे। नब्बे और दो हजार के दशक में गठबंधन की सरकारों को बनाने और चलाने में भी वाम दलों की बड़ी भूमिका रही है। 2004 के लोकसभा चुनाव में संसद में उनके सांसदों की संख्या 60 के करीब थी। लेकिन पिछले एक दशक से चुनावी राजनीति में वाम दल पिछड़ते नजर आ रहे हैं। अब तो हाल यह है कि लेफ्ट की सरकार मात्र एक ही राज्य, केरल में सिमट कर रह गई है।
2024 के लोकसभा चुनाव के बाद राजनीतिक समीकरण बदलने और इंडिया गठबंधन के बेहतर प्रदर्शन के बाद देश और राज्यों में फिर से गठबंधन की सरकारों का दौर लौटने के संकेत मिलने लगे हैं। ऐसे में वाम दलों की सक्रियता फिर से बढ़ने लगी है। पिछले दिनों सीपीएम महासचिव, सीताराम येचुरी के निधन पर वाम राजनीति की प्रासंगिकता और सक्रियता की चर्चा फिर होने लगी है। ऐसे में हरियाणा के चुनाव में लेफ्ट के फिर से सक्रिय होने की गुंजाइश से राज्य चुनाव में उनकी दावेदारी को समझा जा सकता है। क्योंकि हरियाणा में अक्टूबर 5 को विधानसभा चुनाव है और दशकों बाद राज्य में कांग्रेस के साथ गठबंधन के तहत CPM के उम्मीदवार को सीट मिली है। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि अगर CPM उम्मीदवार जीतते हैं तो 37 साल बाद फिर वाम दल की हरियाणा में वापसी होगी।
37 साल बाद हरियाणा में बन सकता है लेफ्ट पार्टी का एमएलए
इस बार हरियाणा चुनाव में कांग्रेस ने सरप्राइज गिफ्ट की तरह भिवानी सीट अपने सहयोगी CPM के लिए छोड़ दी है। सीपीएम ने भिवानी जिला अध्यक्ष और स्टेट कमेटी के सदस्य, ओम प्रकाश को भिवानी से अपना उम्मीदवार बनाया है। कांग्रेस ने भी ओम प्रकाश को समर्थन देने की बात कही है। अगर ओमप्रकाश यह चुनाव जीत जाते हैं तो 37 साल में ऐसा पहली बार होगा जब वाम दल का कोई नेता एमएलए बनेगा।
कौन हैैं सीपीएम नेता ओम प्रकाश
भिवानी से चुनाव का पर्चा भरने के बाद ओमप्रकाश ने उम्मीदवार बनाने के लिए है अपनी पार्टी CPM और कांग्रेस को धन्यवाद देते हुए कहा कि वह जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने की कोशिश करेंगे। भिवानी सीट पर ओमप्रकाश का सीधा मुकाबला भाजपा के वर्तमान एमएलए और पूर्व मंत्री घनश्याम सर्राफ से है।
बैंक कर्मचारियों के नेता के रूप में ओमप्रकाश के राजनीतिक सफर की शुरुआत हुई थी। 2014 में यूको बैंक के चीफ मैनेजर के पद से इस्तीफा देने के बाद वे पूरी तरह से सामाजिक और राजनीतिक आंदोलन से जुड़ गए। वह अपने गैर राजनीतिक संगठन, जन संघर्ष समिति के माध्यम से स्थानीय लोगों और व्यापारियों के मुद्दे उठाते रहे हैं। राज्य कर्मचारियों और किसानों के आंदोलन की भी अगुवाई करते रहे। 2018 में हरियाणा रोडवेज कर्मियों की हड़ताल के दौरान उनकी सक्रियता के कारण उन्हें पुलिस की लाठी भी खानी पड़ी और जेल भी जाना पड़ा। 2020 और 21 के किसान आंदोलन के दौरान भी उन्हें गिरफ्तार किया गया। सीपीएम नेता के तौर पर ओमप्रकाश महिला सुरक्षा, वंचितों और किसानों के मुद्दों को उठाते रहे हैं। भिवानी से टिकट मिलने के बाद ओमप्रकाश ने कहा कि अगर वह चुनाव जीतते हैं, तो केरल सरकार की तर्ज पर हरियाणा में भी पीडीएस (PDS) के तहत 14 खाद्य पदार्थों की सप्लाई के लिए प्रयास करेंगे। अभी हरियाणा में पीडीएस के तहत केवल गेहूं और चावल ही मिलता है।
Haryana Election में 37 साल बाद होगी वाम की वापसी
हरियाणा में CPM को आखिरी बार 1987 में विधानसभा चुनाव में जीत मिली थी। जब पार्टी के उम्मीदवार हरपाल सिंह, टोहाना विधानसभा सीट से चुनाव जीते थे। यह चुनाव CPM ने देवीलाल के लोक दल (ब) के साथ गठबंधन में लड़ा था। उसके बाद वर्ष 1991 में सीपीएम ने पूर्व मुख्यमंत्री बंसीलाल की हरियाणा विकास पार्टी के साथ गठबंधन में चार सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन लेकिन उनकी झोली में एक भी सीट नहीं आई। अब बदलते चुनावी समीकरण और राजनीतिक परिपेक्ष्य में इंडिया गठबंधन की राजनीति ने हरियाणा में वाम पार्टी को एक बार फिर मौका दिया है। देखना होगा कि इतने लंबे अंतराल के बाद क्या CPM एक बार फिर राज्य की राजनीति में वापसी कर सकेगी?