Ganesh Chaturthi : गणपति उत्सव हमारे जीवन में उल्लास और उमंग लेकर आता है। गणपति उत्सव के 11 दिनों में भक्त, गणपति को अपने घर पर या सार्वजनिक पूजा पंडालों में बड़ी धूमधाम से गाजे बाजे के साथ स्थापित करते हैं, उत्सव मनाते हैं, परिवार और मित्रों के साथ पूजा करते हैं, खुशियां बांटते हैं। फिर उत्सव समाप्त होने के बाद भारी मन से बप्पा को विदाई देकर जल में विसर्जित कर देते हैं। कभी-कभी दिल में यह विचार भी आता है कि जिस बप्पा को हम इतने प्यार से स्थापित करते हैं, उनकी पूजा करते हैं,मोदक बनाते हैं, खुशियां बांटते हैं उन्हें आखिर में विसर्जित क्यों करना पड़ता है ? इसके पीछे भी एक खास कारण है। आईए जानते हैं विस्तार से।
गणपति की मूर्ति को क्यों करते हैं विसर्जित
गणपति को लेकर बहुत सी कथाएं प्रचलित हैं। कथा है कि मां पार्वती स्नान से पहले अपने शरीर पर चंदन और हल्दी का लेप लगाती थी फिर स्नान करती थी। एक बार उन्होंने इसी हल्दी और चंदन के लेप से एक बालक की मूर्ति बनाई और उसे जीवित रूप दे दिया। इस बालक को उन्होंने नाम दिया गणेश और बाल गणेश से कहा जब तक वह स्नान कर रही हैं, वह द्वार पर ही पहरा देते रहे और किसी को इस ओर ना आने दे। इसके बाद की कथा तो हम में से ज्यादातर लोग जानते ही हैं।
कहा जाता है, इसी कथा के आधार पर गणेश उत्सव के दौरान हल्दी, चंदन और मिट्टी से गणपति की मूर्ति बनाने की परंपरा आरंभ हुई। गणेश चतुर्थी के उत्सव पर अधिकांश जगह हाथ से चंदन और मिट्टी की मूर्ति बनाई जाती है। लोग हाथ से बनी मिट्टी की मूर्तियां ही घर लाकर स्थापित करते हैं। धातु या पत्थर की मूर्ति की तरह यह मूर्तियां ज्यों की त्यों नहीं रह सकती इसलिए इनका जल्दी क्षरण होता है। मूर्तियां खंडित भी हो जाती हैं, इसलिए इस रूप में इन मूर्तियों को हमेशा के लिए रखना शायद उचित न जान पड़ा हो। यह भी एक वजह है कि श्रद्धालु, उत्सव के बाद इन मूर्तियों को जल में विसर्जित कर विदा कर देते हैं।
गणपति के पुनः आगमन का करते हैं इंतजार
गणेश चतुर्थी उत्सव (Ganesh Chaturthi ) मना कर गणपति विसर्जन के समय भक्त यही कहते हैं कि अगले बरस गणपति जल्दी आना। यानी विदा देकर भी आगमन के स्वागत के इंतजार में एक वर्ष बप्पा के आशीर्वाद के साथ व्यतीत करते हैं।
मिट्टी की मूर्ति वापस मिट्टी को लौटाना
कई सौ साल पहले गणेश चतुर्थी उत्सव या पूजा के समय लोग मिट्टी से ही मूर्ति बनाते थे। इसके लिए तालाब और नदी किनारे की मिट्टी लेकर मूर्ति बनाते और उसे प्राकृतिक वस्तुओं जैसे हल्दी, चंदन, फूल और पत्तों से सजाते थे और उत्सव के बाद मूर्ति को बहते पानी में विसर्जित करते थे। इसके पीछे पर्यावरण और पानी के जीव जंतुओं के संरक्षण की सोच भी रहती थी।
फिर लौटा इको फ्रेंडली मूर्तियों का दौर
Ganesh Chaturthi के उत्सव पर आजकल तो लोग तरह-तरह के इको फ्रेंडली पदार्थ से गणेश की मूर्तियों का निर्माण कर रहे हैं। मिट्टी से तो मूर्तियां बनाई ही जा रही हैं। अब तो आटे और चॉकलेट जैसे पदार्थों से भी लोग गणेश की मूर्तियां बना रहे हैं, जो पूरी तरह से बायोडिग्रेडेबल ( Biodegradable) होती हैं। भगवान गणेश को विघ्नहर्ता माना गया है। माना जाता है कि प्रथम पूजनीय, भगवान गणेश की स्तुति से सारे विघ्न समाप्त हो जाते हैं। ऐसी भी मान्यता है कि भक्त, भगवान की मूर्ति के साथ अपने सब दुख और चिंताओं को भी विसर्जित कर देते हैं।