Friday, April 10, 2026
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Devuthani Ekadashi उठो देव बैठो देव, कुंवारिन के विवाह करो, ब्याहन के चलाय करो

Devuthani Ekadashi

by KhabarDesk
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Devuthani Ekadashi

Devuthani Ekadashi : देवोत्थानी एकादशी से शुभ कार्यों का पुर्न आरंभ माना जाता है। कार्तिक माह शुक्ल ‌पक्ष‌ की देवोत्थानी का दूसरा नाम ग्यारस भी है। इसे देव प्रबोधिनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। चार माह चातुर्मास पाताल के राजा बलि के बंधन में रहने के बाद लक्ष्मी जी दैत्यराज बलि को अपना भाई बनाने के बाद ही उन्हें उस बंधन से मुक्त करा पाई थीं। विष्णु जी को उनका साम्राज्य सौंप कर शिव जी भार मुक्त हो गये।

देवोत्थान एकादशी से होती है शुभ मुहूर्त की शुरुआत

देवोत्थान एकादशी से सभी शुभ कार्य संसार में जगत के पालनहार के आ जाने से प्रारम्भ हो जाते हैं। यह एक अबूझ मुहूर्त होता है। सर्वप्रथम विष्णु जी का ही विवाह तुलसी के साथ होता है। जिसके लिये गन्ने का मंडप बना कर चौक पूरकर बड़ी धूमधाम से तुलसी मैया का विवाह उनके साथ करते हुये शंखनाद किया जाता है। जिसके बाद कहा जाता है *उठो देव बैठो देव ,कुंवारिन के विवाह करो ,ब्याहन के चलाय करो।

शालिग्राम और तुलसी विवाह की भी है परंपरा

पहले कम उम्र में विवाह कर दिये जाने के बाद जब लड़की बड़ी हो जाती थी तभी इसी शुभ मुहूर्त में ससुराल जाती थी। चलाय का अर्थ है दूसरी बिदा से था। इस तरह लक्ष्मी जी के साथ ही वृंदा के शाप से शालिग्राम हुये विष्णु का विवाह वृंदा के तुलसी रूप में उगने पर उनके साथ हुआ। विष्णु का अर्थ है विश्व के कण-कण में जो व्याप्त है। तुलसी पावन पवित्र औषधीय गुणों से युक्त पौधा जिसके विना भगवान भोग ग्रहण नही करते उनके भोग में तुलसी अनिवार्य ‌है। यह तुलसी का महत्व है।

पापों का विनाश करने वाला एकादशी का व्रत

Devuthani Ekadashi

इस एकादशी (Devuthani Ekadashi) का व्रत व्यक्ति के जीवन में किये सभी पापों का विनाश ‌करने वाला है। लक्ष्मी जी का इस व्रत को करने वाले को आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस व्रत में दान का सबसे अधिक महत्व है। कार्तिक स्नान करने वाली महिलाओं के द्वारा आज के दिन विशेष रूप से गाय के दूध से ठाकुर जी को स्नान करवाने के पश्चात उन्हें नये वस्त्र पहना कर एक दूल्हे के रूप में सजाकर बाकायदा तुलसी मैया को चुनरी उढ़ा कर उन्हें श्रृंगार की सामग्री समर्पित ‌करते हुये‌ रात्रि को दीपावली की तरह दीपक जलाकर उनका विवाह गांठ जोड़ कर किया जाता है। इसके बाद उनकी विदाई के लिये शुद्ध घी की डलिया जिसमें लडडू ,गुझिया ,लोलकुचैया ,माठे खाकरा आदि सभी बना कर कार्तिक पूर्णिमा को उनकी बिदाई की जाती है। बाद में वह सब सामान प्रसाद के रूप में सभी को वितरित कर दिया जाता है। इस तरह  Devuthani Ekadashi में तुलसी विवाह की परम्परा है।
ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय।
उषा सक्सेना-

डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारी सामान्य संदर्भ के लिए है और इसका उद्देश्य किसी धार्मिक या सांस्कृतिक मान्यता को ठेस पहुँचाना नहीं है। पाठक कृपया अपनी विवेकपूर्ण समझ और परामर्श से कार्य करें।

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