Kesari Chapter 2 : साल 1919 में बैसाखी के दिन जलियांवाला बाग का नरसंहार हर हिंदुस्तानी की यादों में बसी स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी वह सच्चाई है, जो न सिर्फ किसी भी हिंदुस्तानी के दिल दिमाग और आत्मा झकझोर देती है, बल्कि अंग्रेजी राज की बर्बरता और नृशंसता की एक दिल दहला देने वाली मिसाल बनकर आज भी मौजूद है। जब ब्रिटिश सरकार ने निहत्थे लोगों पर जिसमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे उन पर गोलियों की बौछार कर दी थी और कई लोगों को मौत के घाट उतार दिया था। एक ऐसी क्रूर सच्चाई जिसके लिए ब्रिटिश राज आज भी पूरी दुनिया के सामने शर्मिंदा है। 100 साल से ज्यादा समय गुजर जाने के बाद भी ब्रिटिश राज के ऊपर से यह दाग धुल नहीं पाया है। इस घटना का असर ऐसा था कि एक शताब्दी बीत जाने के बाद एक ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने जलियांवाला बाग पहुंचकर इस घटना के लिए अफसोस जाहिर किया, इसे शर्मनाक घटना बताया और मृतक शहीदों को श्रद्धांजलि दी। एक दूसरी ब्रिटिश प्रधानमंत्री थेरेसा मे ने भी ब्रिटिश पार्लियामेंट में इसे ब्रिटिश इतिहास का काला धब्बा बताया था।
जलियांवाला बाग कांड पर बहुत कुछ लिखा गया है। बहुत सा साहित्य रचा गया है और कई फिल्मे भी बनी है। लेकिन आज भी यह घटना आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिए एक बार फिर इसी घटना से जुड़े एक कम जाने पहचाने शख्स की कहानी एक फिल्म के जरिए सामने लाने की कोशिश की गई है । निडरता से अंग्रेजी राज की बर्बरता के खिलाफ बागी तेवर अपनाने वाले एक वकील की कहानी को इस फिल्म के जरिए पेश किया गया है, जो अंग्रेजी राज, उसकी हुकूमत की शक्ति और उसकी बर्बरता से डरे नहीं और सच्चाई के लिए खड़े रहे ।
उन्हीं की कहानी पर आधारित केसरी चैप्टर 2: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ जलियांवाला बाग 2025, एक ऐतिहासिक कोर्ट रूम ड्रामा फिल्म है, जो करण सिंह त्यागी द्वारा निर्देशित और धर्मा प्रोडक्शंस, लियो मीडिया कलेक्टिव और केप ऑफ गुड फिल्म्स द्वारा निर्मित है। फिल्म में अक्षय कुमार , आर. माधवन और अनन्या पांडे ने मुख्य भूमिका निभाई है। इसे 18 अप्रैल 2025 को जलियांवाला बाग हत्याकांड की 106 वीं बरसी पर रिलीज किया गया है।
इस शख्स की निडरता का जिक्र खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जलियांवाला बाग नरसंहार की 106 वीं बरसी पर करते हुए इस देश भक्त को याद किया था। इस देश प्रेमी विधि वेत्ता का नाम था सर चेत्तूर शंकरण नायर (Sir Chettur Sankaran Nair)
जिन्होंने ब्रिटिश राज के एक वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ एक ऐतिहासिक अदालती लड़ाई लड़ी, जनरल ओ डायर ने 1919 के जलियांवाला बाग नरसंहार के लिए जिम्मेदार ठहराये जाने पर सर संकरण पर ही मुकदमा दायर कर दिया था।
सर संकरण ने जलियांवाला बाग नरसंहार की बर्बरता के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की थी और ब्रिटिश शासन को चुनौती दी थी। यह घटना उत्तर भारत के पंजाब प्रांत में घटी थी और सर संकरण नायर केरल के रहने वाले थे। पंजाब में घटी इस घटना ने उन्हें उद्वेलित कर दिया था। और यह लड़ाई उन्होंने अकेले अपने बलबूते पर ब्रिटिश राज के खिलाफ लड़ी थी।
पृष्ठभूमि में रहकर स्वाधीनता संग्राम के लिए काम करने वाले सिपाही पर आधारित फिल्म Kesari Chapter 2 शुक्रवार, 18 अप्रैल 2025 को रिलीज हुई है। केसरी चैप्टर 2, 2019 में प्रकाशित हुई एक किताब “The case that shook the Empire : One Man’s Fight for the truth about the Jallianwala Bagh Massacre” पर आधारित है। यह किताब एक ऐसे अकेले इंसान के संघर्ष की कहानी दर्शाती है, जिन्होंने जलियांवाला बाग नरसंहार की सच्चाई सबके सामने लाई थी और अकेले अपने दम पर यह लड़ाई अदालत में लड़ी थी। सर शंकर नायर के पड़पोते रघु पलात और उनकी पत्नी पुष्पा पलात ने यह किताब लिखी है।
अंग्रेजी राज का वो एक बागी वकील
सर संकरण नायर का जन्म 1857 में केरल के मालाबार इलाके में पलक्कड़ जिले के मनकारा गांव के एक कुलीन परिवार में हुआ था। प्रेसीडेंसी कॉलेज मद्रास से स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण करने और वकालत की डिग्री लेने के बाद वे Sir Horatio Shepherd के साथ काम करने लगे थे, जो बाद में मद्रास हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस भी बने। शुरू से ही काम करने के दौरान उनकी छवि एक ऐसे निडर वकील की बन गई थी, जो बिना किसी समझौते के अपने केस के प्रति सदा प्रतिबद्ध रहते थे। वह जिस बात पर यकीन करते थे उस पर अड़े रहते थे, चाहे उनका विरोधी कितना भी ताकतवर क्यों ना हो। यही वजह थी कि वह ब्रिटिश सरकार की आंख में खटकने लगे थे। और इतना ही नहीं अपनी इस सच्चाई के लिए अड़े रहने वाले रवैये की वजह से अपने साथी वकीलों के बीच भी उनकी चर्चा होती और उन्हें ना पसंद किया जाने लगा। इतना ही नहीं मद्रास का ब्राह्मण समाज भी उन्हें पसंद नहीं करता था ।
भारत के तत्कालीन सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट एडविन मांटेग्यू ने एक बार संकरण नायर का वर्णन करते हुए उन्हें “असंभव व्यक्ति बताया था जो ऊंची आवाज में चिल्ला कर बात करता था और बहस के दौरान किसी को भी सुनने से इनकार कर देता था और अपने केस को लेकर कोई समझौता नहीं करता था।” यह बातें इसी किताब में लिखी गई हैं।
एक वकील के रूप में नायर की तर्क क्षमता अद्वितीय थी। एक समाज सुधारक के रूप में भी उनकी साख बन चुकी थी। 1897 में वे इंडियन नेशनल कांग्रेस के सबसे कम उम्र के प्रेसिडेंट भी बने। 1908 में वे मद्रास हाई कोर्ट के स्थाई जज के रूप में नियुक्त किए गए। 1914 के Budasna v Fatima केस में उनका दिया गया फैसला समाज सुधार के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। जो उनके कुछ बेहतरीन फैसलों में गिना जाता है। इस फैसले में उन्होंने कहा दूसरे धर्म से जिन्होंने हिंदू धर्म अपनाया है, उनसे जात बहिष्कृत की तरह व्यवहार नहीं किया जा सकता। साथ ही उन्होंने कई दूसरे मुकदमों में अंतर जातीय विवाह और अंतर धार्मिक विवाह को भी सही ठहराया था।
महान देश भक्त थे सर संकरण नायर
नायर भारत के लिए स्वराज के अधिकार में विश्वास रखते थे।1919 में मोंटेग्यू चेम्सफोर्ड सुधार के अंतर्गत उन्होंने प्रोविजन के विस्तार में भी एक अहम रोल अदा किया था। इस सुधार के अंतर्गत Dyarchy की व्यवस्था पेश की गई थी। जिसे द्वैध शासन कहा जाता धा। इसके द्वारा शासन प्रशासन में भारतीय लोगों को ज्यादा भागीदारी मिल पाई थी।
जलियांवाला कांड के बाद उन्होंने इस घटना से उद्वेलित होकर विरोध स्वरूप वायसराय काउंसिल से इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने माइकल ओ डायर (Michael O’Dwyer ) जो पंजाब के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर थे उनको इस नरसंहार के लिए जिम्मेदार ठहराया था । उन्होंने कहा कि उनकी नीतियों के कारण ही इतने लोग बे मौत मारे गए। उनके इस बयान से खफा होकर डायर ने नायर पर ही इंग्लैंड की अदालत में मानहानि का मुकदमा दायर कर दिया। डायर को उम्मीद थी कि इंग्लिश कोर्ट उनका ही पक्ष लेगा। लंदन में किंग बेंच के सामने यह मुकदमा साढे 5 सप्ताह तक चला। यह उस समय का सबसे लंबा सिविल केस था। 12 सदस्यों की इंग्लिश ज्यूरी की अध्यक्षता हेनरी मैकारडी कर रहे थे। जैसा की डायर को उम्मीद थी इस जूरी ने उनका ही साथ दिया। जूरी के सदस्य ओ डायर के प्रति अपना पक्षपात नहीं छुपा पाए थे और जूरी ने 11 – 1 के मत से डायर का पक्ष लिया। जूरी का केवल एक सदस्य जो उनसे सहमत नहीं था वह थे मार्क्सिस्ट पॉलिटिकल थियेरिस्ट हेराल्ड लास्की । इस केस में नायर को 500 पाउंड जुर्माना देने के लिए कहा गया और साथ ही इस पूरे मुकदमे का खर्च भी वहन करने को कहा गया।
ब्रिटिश राज के आगे कभी झुके नहीं
ओ डायर ने नायर से कहा वे जुर्माना माफ कर देंगे अगर नायर अपनी कही गई बात के लिए माफी मांग लें। लेकिन नायर ने झुकने से इनकार कर दिया और अपनी बात पर अंत तक अटल रहे। इस केस ने भारत में ब्रिटिश शासन व्यवस्था पर गहरा असर डाला। यह ऐसा वक्त था जब राष्ट्रीय आंदोलन जोर पकड़ रहा था और ऐसे में एक विधिवेत्ता द्वारा ब्रिटिश सरकार का खुलकर विरोध करना बहुत बड़ी बात थी। भारतीयों ने जब इस केस के पक्षपात पूर्ण रवैये को देखा तो ब्रिटिश शासन से उन्हें और भी नफरत हो गई। नायर का यह योगदान इतिहास में दर्ज होकर रह गया। जिसने उस समय के स्वतंत्रता संग्राम के कई नायकों को प्रेरणा दी। सर संकरण नायर की मृत्यु 1934 में 77 वर्ष की आयु में हुई थी।