Eid ul azha : जी हां, बकरीद से पहले भी रोज़े रखे जाते हैं। हालांकि यह रमज़ान की तरह फ़र्ज़ यानी अनिवार्य नहीं होते और न पूरे महीने के होते हैं।
बकरीद से पहले 9 दिन के रोज़े रखे जाते हैं और यह स्वैच्छिक होते हैं। लेकिन 9 वां रोज़ा यानी बकरीद से पहले दिन वाला रोज़ा तो बहुत ख़ास होता है। इसे यौमे अरफ़ा कहा जाता है और इसे लगभग सभी मुसलमान रखते हैं।
हदीस (सही मुस्लिम): “अरफ़ा के दिन का रोज़ा पिछले साल और आने वाले साल के गुनाहों का कफ़्फ़ारा बनता है।” कफ़्फ़ारा का मतलब है– “गुनाह या गलती का प्रायश्चित करने के लिए किया गया विशेष अमल या भरपाई”
जैसे ईद रमज़ान के महीने के बाद शव्वाल महीने की पहली तारीख़ को मनाई जाती है। वैसे ही बकरीद ज़िलहिज्जा महीने के 10 वें दिन मनाई जाती है।
यह हज़रत इब्राहीम की क़ुर्बानी की याद में होती है। इस दिन जानवर की क़ुर्बानी दी जाती है।
आपको मालूम है कि रमज़ान, शव्वाल और ज़िलहिज्जा ये सब इस्लामी कैलेंडर के मुताबिक महीनों के नाम हैं। रमज़ान 9 वां महीना होता है और ज़िलहिज्जा साल का आख़िरी यानी 12 वां महीना। इस्लाम में यह सब पवित्र महीने कहे जाते हैं।
“ज़िलहिज्जा” का मतलब होता है – “हज वाला महीना” यानी यह महीना हज का समय है। हर साल लाखों मुसलमान इस महीने मक्का (सऊदी अरब) में हज करते हैं।
आपको मालूम है कि इस्लामी कैलेंडर चांद पर आधारित होता है। चांद की गति के आधार पर ही महीने बदलते हैं इसलिए कभी 29 वें, कभी 30 वें नए चांद के बाद अगला महीना शुरू होता है इसलिए ईद, बकरीद की केवल तारीख़ें ही नहीं बल्कि मौसम भी बदल जाता है। इसलिए ईद (चाहे ईद-उल-फित्र हो या ईद-उल-अज़हा) हर साल 10–11 दिन पहले आती है। इसलिए कुछ सालों में ईद पूरे मौसमों का चक्कर लगा लेती है। यही वजह है कि कभी ईद गरमी में आती है, कभी सर्दी में और कभी बरसात में।