Thursday, March 5, 2026
Home धर्म कर्म 144 साल बाद भारतीय सनातन संस्कृति की नवचेतना को जागृत करेगा दिव्य महाकुंभ

144 साल बाद भारतीय सनातन संस्कृति की नवचेतना को जागृत करेगा दिव्य महाकुंभ

by KhabarDesk
0 comment
Mahakumbh 2025

Divya Mahakumbh: तीर्थों के तीर्थ प्रयागराज में माघ मास गंगा स्नान और कल्पवास का अपना विशेष महत्व है। यह महत्व तब और अधिक बढ़ जाता है जब साधारण बारह वर्ष के कुंभ मेले के स्थान पर 144 वर्ष के पश्चात दिव्य महाकुंभ का आयोजन होता है । यह केवल धार्मिक अनुष्ठान और उत्सव का मेला ही नहीं वरन आध्यात्मिक जागृति का प्रतीक भी है । जब लाखों की संख्या में अज्ञात ‌स्थान से आये नागा साधुओं के प्रदर्शन देखने लायक होगें । उनके अखंड तप और साधना की शक्ति से गंगा के साथ ही प्रयागराज की भूमि भी अधिक पावन पुनीत हो जाएगी । कहते हैं जब भागीरथ शिवजी को प्रसन्न कर गंगा को धरातल पर ला रहे थे, तो उस समय गंगा जी ने शिवजी से प्रार्थना करते हुये कहा था कि :-“हे प्रभु! पृथ्वी पर पापियों के पाप का प्रक्षालन करते जब मैं स्वयं मैली हो जाऊंगी तो मुझे कौन पुनः पवित्र करेगा तब उस समय कैलाश पर्वत पर उपस्थित शिव भक्त नागा साधुओं ने प्रतिज्ञा करते हुये कहा कि हम अपनी कठोर साधना और तप के फल को आपको प्रदान करते हुये सबसे पहले स्नान कर आपको शुद्ध करेंग‌ें। इसके बाद ही सामान्य जन स्नान कर सकेंगे ।

144 वर्ष बाद लग रहा है दिव्य महाकुंभ

144 वर्ष के बाद आने वाला दिव्य महाकुंभ अपने आप में विशिष्ट और अद्वितीय होता है । इसे देखना हर किसी के भाग्य में नही होता । इस समय का साक्षी होकर उसका दिव्य दर्शन करना भी अपने आप में ही गौरवपूर्ण है। इस समय ब्रह्माण्ड की खगोलीय स्थिति भी महत्वपूर्ण होती है। सूर्यदेव प्रत्यक्ष देव के रूप में प्रकट होकर सभी को प्रकाशित करते हैं, जबकि देवगुरु बृहस्पति ज्ञान के देवता होकर सभी को साधु-संतों की वाणी द्वारा अपना ज्ञान बांटते हैं जिसमें ग्रहों की राशि के साथ ही नक्षत्र तिथि और दिन का भी अपना विशेष महत्व होता है । इस समय सूर्यदेव का धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश, मकर शुक्र की राशि में वक्री , मंगल कर्क राशि में वक्री ,शुक्र कुंभ राशि में शनि के साथ,बुध धनु राशि में ,राहु मीन और केतु कन्या राशि में स्थित हैं । इन खगोलीय ग्रहों की स्थिति का प्रभाव मानव पर भी पड़ता है।

प्रयागराज में कल्पवास और माघ स्नान का महत्व :-

पौषी पूर्णिमा के समाप्त होते ही माघ मास का प्रारंभ होता है। सूर्यदेव की उपासना और आराधना का माह ‌पुण्य पुनीता गंगा यमुना के मिलन से उत्पन्न सरस्वती नदी की अंत:स्रावी धारा में ब्राह्म मुहूर्त संगम में स्नान करने के पश्चात ही ज्ञान के उज्जवल प्रकाश में सराबोर करता है। प्रयागराज का आदिकाल से अपना महत्व है, जिसका जन्म ही ऋषि-मुनियों के ज्ञान-यज्ञ से हुआ था। जहां ज्ञान यज्ञपीठ है, जहां पर ज्ञान की गंगा सूर्यपुत्री यमुना के साथ अनवरत बहती ही रहती है। अपनी पुत्री से मिलने के लिये स्वयं सूर्यदेव आते हैं । यहां पर पुत्र शनि के साथ संयोग कर शीतल रश्मियों से अंत में अपना आशीर्वाद संपूर्ण जगत को देकर चले जाते हैं। सरस्वती में अवगाहन कर सभी योगी सन्यासी ऋषि मुनि एवं तपस्वियों का जमावड़ा लगा रहता है। पूरे एक माह माघ में गंगा के तट पर कल्पवास करते हुए मेला लगा रहता है। पहले यह केवल श्रद्धालु और ज्ञानार्जन के लिये आये लोगों के लिये ही होता था। अबआस्था और श्रद्धा से दूर अध्यात्म का स्थान भौतिक बाह्य चकाचौंध और दिखावे ने ले लिया है।

पूरे एक माह के लिये घास फूस की बनी झोपड़ी में इतनी ठंड में बिना आधुनिक सुख सुविधा के कल्पवास करना किसी तपस्या से कम नहीं । यह भी आत्म शुद्धि की एक साधना है  जिसमें बिना किसी भौतिक साधनों के व्यक्ति अपने मन को साधते हुये ही साधना करता है । इस समय सूर्यदेव स्वयं दक्षिणायन से निकल कर उत्तरायण की ओर जाने की प्रक्रिया में गतिशील होने से उनकी किरणें अमृत वर्षा करती हुई आत्मशक्ति को बल देती हैं । यह सूर्योपासना और उनकी आराधना का माह है।

पौराणिक कथा:-

एक बार गरुड़ जी ने अपने बड़े भाई अरुण जो कि सूर्यदेव के रथ के सारथि हैं उनसे सौर धर्म क्या है ? इस विषय में जानना चाहा । तब अरुण ने उनके प्रश्न का उत्तर देते हुये कहा कि सौरधर्म ही अज्ञान के अंधकार में डूब रहे प्राणियों का उद्धार करने वाला है। जो लोग भक्तिभाव से माघ मास में सूर्यदेव का स्मरण करते हुये संगम में स्नान कर दान पुण्य करते हुये उनकी अराधना करते हैं, वह आत्म ज्ञान के द्वारा परम पद प्राप्त करते हैं। यहां ज्ञान की गंगा का प्रवाह अनवरत है। ऋषि-मुनियों के द्वारा ज्ञान का विपुल भंडार लुटाया जाता है। मानव जीवन दुर्लभ है और इस मानव जीवन में ही व्यक्ति अपनी मुक्ति का द्वार खोजता है । धर्म अर्थ ,काम, मोक्ष इन सबके दाता भुवन भास्कर ही हैं जो अपनी भासित किरणों से अज्ञान के अंधकार को दूर कर उज्जवल ज्ञान के प्रकाश को देते हैं। प्रत्यक्ष देव के रूप में सूर्यदेव ही सबसे बड़े देव हैं जिनके दाहिने भाग में विष्णु और वाम भाग में शंकर तथा मध्य भ्रू ललाट में ब्रह्माजी सदा स्थित रहते हैं। सूर्यदेव में अग्नि स्थित है । इसीलिये अग्निहोम के द्वारा मानव निरोग हो जाता है। स्वयं श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब सूर्यदेव की आराधना करके ही कुष्ठ रोग से मुक्त हुये थे ।

सूर्य पुत्री यमुना:-

गंगा यदि सतो गुणी हैं, तो सूर्य पुत्री यमुना रजोगुणी होकर राजसी सुख वैभव ऐश्वर्य और सम्मान को देने वाली हैं । वह श्रीकृष्ण की अर्द्धांगिनी हैं और मृत्यु के देवता यमराज की बहिन भी होने से अकाल मत्यु के भय को हरण करती है।

ज्ञान की देवी सरस्वती:- अंत: स्रावी सरस्वती अप्रत्यक्ष रूप से गंगा और यमुना के मध्य आकर मिलते हुये उसे त्रिवेणी संगम का रूप देती हैं।
ब्रह्म का ज्ञान बिना सरस्वती की कृपा के मिलना असंभव है। भक्तियोग, क्रिया योग और ज्ञान योग का अद्भुत संगम है त्रिवेणी,जहाँ से मोक्ष का द्वार खुलता है। कुण्डलिनी जाजागरण का यही अध्यात्म है।

दिव्य महाकुंभ स्नान का विशेष महत्व

Divya Mahakumbh 2025

एक पौराणिक कथा के अनुसार गौतम ऋषि के द्वारा शापित होने पर स्वयं इन्द्रदेव ने माघ मास में गंगा स्नान करते हुये अपने पाप का प्रायश्चित किया था। महाराज हर्षवर्धन पूरे एक माह प्रयागराज में रहते हुये गंगा स्नान के बाद जो कुछ भी उनके पास होता था उसे दान करते हुये अंत में अपनी बहिन राजश्री से वस्त्र लेकर वही पहनते थे। महाराज हर्ष की ऐसी ही दानशीलता के कारण प्रसन्न होकर मतंग मुनि ने भगवान शिव के द्वारा प्रदत्त मणि उन्हे आशीर्वाद में दी थी। इस तरह माघ मास में कल्पवास गंगा स्नान तथा दान का अपना महत्व है। पुण्य की जड़ पाताल के पीछे छिपा गूढ़ रहस्य यह था कि कहीं वह मणि आक्रमणकारी आततायियों के हाथ न लग जाये इसलिए उन्होंने उसे जमीन के अंदर गाड़ कर उसके ऊपर ही शिवलिंग की स्थापना करते हुये मंदिर बनवाया जो आज भी मतंगेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध है।

नागा साधु संत स्वयं अपने तप के प्रभाव से शिवरूप होकर हर बारह वर्ष और छै:वर्ष में पड़ने वाले अर्द्ध कुंभ के मेलों मे आकर हरिद्वार में गंगा,उज्जैन में महाकाल की नगरी में शिप्रा और नासिक में गोदावरी नदी में स्नान कर उसके दूषित जल को पवित्र करते हुये अपने तप द्वारा अर्जित साधना के फल को जन हित में आशीर्वाद स्वरूप लुटा जाते है । कुंभ के मेलों का इसीलिए हर किसी को बेसब्री से इंतजार रहता है। यह दिव्य महाकुंभ तो केवल भाग्यशाली लोगों को ही ऊर्जावान होने के लिये मिलता है । संपूर्ण सृष्टि को प्रतीक्षा होती है हिमालय की गुप्त गुफाओं में तप कर रहे साधू संतों के दर्शन की। जिनके स्नान से पवित्र हुये संगम के जल की तरंगों को छूकर वह भी ऊर्जावान होकर ऊर्जित हो सुप्त लोगों के अंदर नवचेतना जागृत करते हुये नवसृष्टि का सृजन करे ।
ऊषा सक्सेना –

डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारी सामान्य संदर्भ के लिए है और इसका उद्देश्य किसी धार्मिक या सांस्कृतिक मान्यता को ठेस पहुँचाना नहीं है। पाठक कृपया अपनी विवेकपूर्ण समझ और परामर्श से कार्य करें।

You may also like

Leave a Comment

About Us

We’re a media company. We promise to tell you what’s new in the parts of modern life that matter. Lorem ipsum dolor sit amet, consectetur adipiscing elit. Ut elit tellus, luctus nec ullamcorper mattis, pulvinar dapibus leo. Sed consequat, leo eget bibendum sodales, augue velit.

@2022 – All Right Reserved. Designed and Developed byu00a0PenciDesign