Apara Ekadashi : ज्येष्ठ मास कृष्ण पक्ष की एकादशी को अचला एकादशी कहते हैं। इसका दूसरा नाम अपरा एकादशी भी है । अपरा का अर्थ है जिसका कोई पार नही, अपार पुण्य को देने वाली एकादशी । इसी प्रकार से अचला के विषय में भी हम कह सकते हैं कि जो चलायमान नही अपितु स्थिर है सदा के लिये । इस दिन दिये गये दान पुण्य का फल कभी क्षीण नही होता इसलिये वह अचल है ।
अपरा एकादशी पर देवी भद्रकाली की पूजा का विधान
इस एकादशी के दिन भगवान विष्णु के साथ ही देवी भद्रकाली की पूजा का भी विधान है। भगवान विष्णु को समर्पित यह एकादशी व्यक्ति के जीवन में उसे अपार धन देती है । उसके द्वारा किये गये , जाने एवं अनजाने सभी पापों का नाश कर मोक्ष का द्वार खोलती है। इस दिन अन्न का परित्याग करते हुये केवल जल और फल को ही भगवान विष्णु को समर्पित करते हुये उसे उनके भोग के रूप में ग्रहण करना चाहिये ।
अचला एकादशी व्रत कथा :-
एक बार युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से कहा कि ऐसा कौन सा व्रत है जिसके करने से व्यक्ति अपने जीवन में किये पापों से मुक्त होकर अपार अचल धन की प्राप्ति कर सकता है । तब श्रीकृष्ण ने कहा कि :-
*ज्येष्ठ मास कृष्ण पक्ष की एकादशी के करने से मानव अपना खोया मान -सम्मान और अपार धन प्राप्त कर सकता है।*
पौराणिक कथा:-
प्राचीनकाल में महीध्वज नाम के धर्मात्मा राजा थे। उनका छोटा भाई उतना ही दुष्ट और क्रूर, अधर्मी एवं अन्यायी था । वह अपने ही बड़े भाई से द्वेष रखने के कारण एक रात्रि उसने अपने सोते हुये भाई की हत्या कर उनके शव को जंगल में एक पीपल के वृक्ष के नीचे गाड़ दिया। अकाल मृत्यु के कारण वह राजा प्रेत योनि में आकर प्रेतात्मा के रूप में उसी पीपल पर निवास करने लगा। प्रेत योनि में होने से वह उस जंगल से गुजरने वाले लोंगों को परेशान करता। इस तरह बहुत समय बीत गया। एक बार धौम्य मुनि जब वहां से जा रहे थे तो उन्होंने अपने तपोबल से उसके विषय में प्रेत योनि में आकर उसके उत्पात करने का कारण जान लिया ।
वह एक धर्मात्मा राजा था किंतु अकाल मृत्यु के कारण उसे यह योनि मिली यह देख कर धौम्य मुनि ने उसे इस योनि से मुक्ति देने के लिये स्वयं अचला एकादशी का व्रत किया और उसे प्रेतयोनि से मुक्त होने के लिये उसका पुण्य प्रेतात्मा राजा को प्रदान किया। जिसके प्रभाव से राजा प्रेत योनि से मुक्त होकर देवयोनि को प्राप्त हुआ । स्वर्ग से उतरे विमान पर बैठने के पूर्व उसने मुनि की परिक्रमा करते हुये उन्हें धन्यवाद देकर उनकी अनुमति पाकर विमान पर बैठ स्वर्ग लोक को गया । इस कथा को कहने सुनने मात्र से ही व्यक्ति इसके फल को पा लेता है। इस तरह भगवान विष्णु को समर्पित यह एकादशी अत्यंत महत्वपूर्ण है । ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय।
उषा सक्सेना