Chhath Puja 2024 : बिहार और पूर्वांचल का महापर्व है छठ पूजा। प्रकृति के छठवें अंश ब्रह्मा की मानस पुत्री हैं छठमैया। यह हमें प्रकृति के संसाधनों का महत्व समझाते हुये मानसिक रूप से उनसे जोड़ती है। शरद ऋतु का कार्तिक मास पूर्ण रूप से लोकोत्सव का महीना है। सनातन संस्कृति का आवाह्न करता भारत वर्ष प्राचीन काल से ही गौ संवर्धन करता हुआ गौपालक एवं कृषि-प्रधान देश रहा। जहां सभी को समान रूप से माना गया है। लोक पर्व में सभी का पूर्ण सहयोग अपेक्षित होता है। सभी के हाथों में काम, समरसता और सहयोग की भावना रहती है तभी तो कार्तिक मास में बरसात को विदा देने के पश्चात खेतों में लहलहाती फसलें, वृक्षों पर लदे फल और फूलों की डालियां नजर आते हैं।
(Chhath Puja) छठ पूजा में हरे बांस का महत्व
आखिर गंगा के तट पर पूजा का सामान लाद कर ले जाने के लिये बहंगी भी तो चाहिये। सूप और टोकरी यह सब बांस से ही बनाए जाते हैं। नये चावल की गाय के दूध और गुड़ में माटी के चूल्हे पर आम की लकड़ी को जलाकर पकाई रसखीर जिसे खिरना कहते हैं। गेहूं को अच्छे से धो बीन कर हाथ से पिसे आटे को गुड़ और घी में बनाये ठेकुआ, जिनका अपना अलग ही स्वाद है।
4 दिन के कठिन व्रत से होती है सूर्य उपासना
हमारे देश के पूर्वांचल क्षेत्र में मनाया जाने वाला यह चार दिवस का कठिन व्रत और त्यौहार है। देश और शहर से दूर जाने के बाद भी ,उस क्षेत्र के लोग जहां भी जाकर बसे हैं इसे सीमित संसाधनों से ही सही पर मनाते अवश्य हैं। वह अपनी संस्कृति को नहीं भूले। किसी भी नदी या सरोवर के तट को मन से शुद्ध सात्विक भाव से गंगाजल मानते हुये उसी में ही कमर तक पानी में खड़े होकर एक दिन अस्ताचल गामी सूरज की प्रत्यूषा अर्थात छाया (संध्या) के साथ पूजा करने के पश्चात दूसरे दिन उगते सूर्य की उषा रूपी पत्नी (संज्ञा) के साथ पूजा करने के पश्चात ही व्रत तोड़ते हैं।
दीपावली के पांच दिन पर्व के बीतते ही शुक्लपक्ष की चतुर्थी से को नहाय धोय ,खाय-पिये के पश्चात् रात्रि से व्रत प्रारम्भ होकर व्रती पंचमी को निराहार रह कर सांझ को डूबते सूरज को अर्ध्य देकर आरती करते हुये सभी प्रकार के फल और मिष्टान्न का भोग लगता है। नहाए खाए कि अगले दिन खिरना बना कर छठी मैया का यशगान करते हुये पूजा करके प्रसाद चढ़ा कर सबको प्रसाद बांटते हैं।
प्रसाद की शुद्धता का विशेष महत्व
छठ पर बनने वाले प्रसाद का विशेष महत्व है। जिसमें सात्विक शुद्धता का विशेध ध्यान रखा जाता है। किसी भी जीव जंतु का उसमें स्पर्श नही होना चहिये। अच्छे मन से प्रसन्नता पूर्वक बनाये प्रसाद के साथ उसमें लोक हित की भावना जुड़ी रहती है। छठी मैया प्रकृति देवी के छठवें अंश से अवतरित हुई ब्रह्मा की मानस पुत्री देवसेना और कात्यायनी देवी के रूप में इनकी पूजा की जाती हैं। नि:संतान दम्पत्ति इनकी आराधना करते हुये देवी के आशीर्वाद से संतान ,यश धन सम्पत्ति सम्मान और वैभव को पाते हैं।
प्राचीन काल में कहते हैं कि मगधराज जरासंध के पूर्वजों ने सर्वप्रथम पटना में छठ मैया की पूजा करके संतान को प्राप्त किया था। तबसे निरंतर यह प्रथा चली आ रही है। सत्य तो यह है कि इस प्रकार से 36 घंटें का कठिन व्रत करते हुये व्यक्ति तन -मन दोनों से ही विचारों की शुद्धता के साथ प्रकृति का सानिध्य प्राप्त करता हुआ उसके प्रति अपना आभार प्रकट करता है। यही तो लोक हित की भावना है जहां सबके हित में ही हमारा हित है। वातावरण की शुद्धता और अन्न का व्यक्ति के सोच चिंतन और विचारों पर गहरा प्रभाव पड़ता है। जैसा खावे अन्न वैसा होय मन।
छठ की पौराणिक कथा :-
प्राचीन काल में प्रियव्रत नाम के प्रभु भक्त राजा हुए थे। बहुत समय तक उनके संतान न होने से वह नि:संतान होने के कारण बहुत दुखी थे। अपने गुरु के कहने पर उन्होंने एक यज्ञ किया जिसके प्रभाव से उनको एक पुत्र हुआ किंतु वह कुछ ही दिनों में मृत हो गया। यह देख राजा अपने भाग्य को कोसते हुये स्वयं आत्म बलि देने लगे तो देवसेना ने उनकी तलवार पकड़ते हुये उन्हें आत्महत्या से रोक कर कहा:-राजन तुमने अपने पुत्र की षष्ठी पूजा नहीं की इससे मैं इसका भाग्य नहीं लिख सकी इसलिये यह मृत हो गया। अब तुम मेरी उपासना करते हुये छठ मैया का पूजन करो जिससे तुम्हें अवश्य ही संतान की प्राप्ति होगी । उसके जन्म के छठवें दिन षष्ठि पूजन अवश्य करना जिससे मैं उसका भाग्य लिख सकूं। राजा प्रियव्रत ने देवी की बात मानकर छठ पूजा का विधान किया जिससे उनको एक वर्ष में ही पुत्र की प्राप्ति हुई।
पुत्र होने के छठवें दिन विधि विधान से छठमैया का पूजन किया। इससे सारे राज्य में हर्ष की लहर दौड़ गई और सभी ने छठ मैया की पूजा करना प्रारंभ कर दिया। देवी अपने सभी भक्त और व्रती की मनोकामना पूर्ण करती हैं। त्रेतायुग में स्वयं सीता जी ने छठ मैया की पूजा से ही लवकुश को पाया था।
द्वापर युग में श्री कष्ण के कहने पर द्रौपदी द्वारा छठ मैया की पूजा कर उनके आशीर्वाद से पांडवों को महाभारत युद्ध में विजय मिली और अपना खोया साम्राज्य पाया था। देवी कात्यायनी ही छठ मैया हैं। देवी अदिति ने उन्हीं के आशीर्वाद से सूर्यदेव को भुवन भास्कर के रूप में पाया था। उनकी महिमा अपरम्पार है।
उषा सक्सेना
डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारी सामान्य संदर्भ के लिए है और इसका उद्देश्य किसी धार्मिक या सांस्कृतिक मान्यता को ठेस पहुँचाना नहीं है। पाठक कृपया अपनी विवेकपूर्ण समझ और परामर्श से कार्य करें।