Thursday, March 5, 2026
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सौ साल बाद एक बार फिर होगी जातिगत जनगणना, फायदा या नुकसान !

by KhabarDesk
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Caste Census :  भारत में 94 साल के बाद एक बार फिर से जाति जनगणना होने जा रही है। 1931 के बाद से यह दूसरी जातिगत जनगणना होगी जिसमें सरकार सभी प्रकार की जातियों के आंकड़े इकट्ठा करेगी। मोदी सरकार का कहना है कि ये जातिगत जनगणना (Caste Census) करना एक महत्वपूर्ण फैसला है, इसका उद्देश्य सामाजिक और आर्थिक समानता को बढ़ावा देना है। इस जातिगत जनगणना की वजह से नीति निर्माण में पारदर्शिता बढ़ेगी। आईए जानते हैं इस जातिगत जनगणना का आम जनता को कितना फायदा या नुकसान होगा ।

पहली जातिगत जनगणना कब हुई :

देश में लगभग 100 वर्षों के बाद एक बार फिर से पूर्ण जातिगत जनगणना होगी। मोदी मंत्रिमंडल में जाति जनगणना करने का महत्त्वपूर्ण निर्णय लिया गया है। इस महत्वपूर्ण कदम का उद्देश्य सभी वर्ग के लोगो में सामाजिक और अर्थिक समानता को बढ़ावा देना है । इससे प्रत्येक जाति की संख्या के अनुरूप उसे देश के संसाधन, नौकरियों और आर्थिक लाभ में हिस्सेदारी देने की कोशिश होगी। विपक्षी दल एक लंबे समय से जातिगत जनगणना की मांग कर रहे थे, केंद्रीय मंत्री अश्विन वैष्णव ने इसकी घोषणा करते हुए कहा है कि यह सामाजिक और आर्थिक समानता को बढ़ाने की ओर एक मजबूत कदम होगा। यह जातिगत जनगणना 1931 के बाद पहली बार की जाएगी। इस जातिगत जनगणना की वजह से सामाजिक न्याय और विकास योजनाओं की ओर अधिक ध्यान जाएगा और उन्हे  पूर्ण रूप से प्रभावशाली बनाया जा सकेगा। 1931 में आजादी से पूर्व ब्रिटिश शासन के तहत जाति जनगणना की गई थी। इस काम के लिए जॉन हेनरी हटन ( John Henry Hutton ) सेंसस कमिश्नर नियुक्त किए गए थे। वे ब्रिटिश राज में भारतीय सिविल सेवा के अधिकारी व मानव विज्ञानी (Anthropologist) थे।

क्या है जातिगत जनगणना: What is Caste Census 

भारत में हर 10 साल में होने वाली जनगणना आमतौर पर आयु, लिंग, शिक्षा ,रोजगार और आर्थिक मापदंडों के आधार पर की जाती है । इससे पहले जब 1941 में जातिगत जनगणना हुई थी । तो उसके आंकड़े प्रकाशित नहीं किए गए थे। 1881 से जनगणना नियमित रूप से हर 10 साल में शुरू हुई। जिससे विकास योजनाएं बनाने मे मदद मिलती थी। हालांकि आजादी के बाद 1951 में यह फैसला लिया गया कि जाति के आधार पर डाटा इकट्ठा करना काफी खर्चीला, समय खपाऊ और सामाजिक एकता के लिए हानिकारक हो सकता है। इसके बाद से केवल एससी और एसटी का ही डाटा इकट्ठा किया जाने लगा। लेकिन इधर कुछ सालों में सामाजिक और राजनीतिक नीतियों में एक बड़े बदलाव को देखा गया। समय के साथ जैसे-जैसे जाति आधारित राजनीति बढ़ने लगी उसी के आधार पर जातीय जनगणना की मांग भी बढी।

अब इस बदलाव के कारण ओबीसी समाज के लिए आरक्षण और कल्याणकारी योजनाओं की मांग काफी बढ़ गई है। जातिगत जनगणना का मतलब यह होता है कि जब जनगणना की जाती है, तो उस दौरान उस व्यक्ति की जाति भी पूछी जाती है। इस जनगणना के आधार पर यह तो पता चलेगा कि देश की आबादी कितनी है इसके साथ ही किस जाति के कितने लोग रह रहे हैं यह भी पता चलेगा। सीधे तौर पर कहा जाए तो जाति के आधार पर की जाने वाली जनगणना जातिगत जनगणना कहलाती है । कांग्रेस के नेता राहुल गांधी ने इसे सामाजिक कल्याण की ओर एक बड़ा कदम बताया और 2024 के लोकसभा चुनाव में इसे एक प्रमुख मुद्दे के तौर पर खड़ा किया था। वहीं दूसरी तरफ केंद्र सरकार ने इसे एक जटिल मुद्दा और सामाजिक एकता के लिए खतरा बताया था ।

जाति जनगणना के फायदे और नुकसान:

Caste Census का समर्थन करने वाले लोगों का मानना है, कि यह सामाजिक न्याय और विकास की ओर एक बड़ा कदम है । उनका कहना है कि जातिगत जनगणना के आधार पर जो भी आंकड़े प्राप्त होंगे वह विभिन्न समुदायों और सामाजिक आर्थिक स्थितियों को समझने के लिए बेहतर ढंग से प्रभावी होंगे। इस जनगणना के आधार पर यह भी पता लगाया जा सकता है कि किस जाति वर्ग के लोगों को रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की सबसे ज्यादा आवश्यकता है । इससे उन जातियों के विकास को लेकर बनाए जाने वाली योजनाओं में आसानी होगी । उदाहरण के तौर पर यदि किसी जाति विशेष में शिक्षा का स्तर काफी कम है तो उसे सुधारने के लिए नई नीतियां बनाई जा सकती है।

दूसरी तरफ कुछ राजनीतिक दलों का यह भी मानना है कि इस जातिगत जनगणना से केवल फायदे ही नहीं इसके नुकसान भी हो सकते हैं । इस जातिगत जनगणना के आधार पर यदि एक विशेष समुदाय या समाज को पता चलेगा कि देश में उनकी जनसंख्या घट रही है। तो वह अपने समुदाय विशेष को जनसंख्या बढ़ाने की और प्रेरित करेंगे । जिससे देश की आबादी में इजाफा होगा। जिसकी वजह से देश में सामाजिक संतुलन बिगड़ने का खतरा बना रहेगा । यह जातिगत जनगणना सामाजिक तौर पर भी लोगों में तनाव और वैचारिक मतभेद को बढ़ावा दे सकती है । इन्हीं सब चीजों का ध्यान रखते हुए 1951 में सरदार पटेल ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था।

अब देखना यह है की जातिगत जनगणना ( Caste Census) वजह से अन्य क्षेत्रीय दलों को इसका फायदा होगा या भाजपा को इसका नुकसान होगा !

बबीता आर्या

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