Caste Census : सरकार ने जाति जनगणना पर फैसला ले लिया है । लगभग 100 साल बाद देश में जातिगत जनगणना होने जा रही है। जातिगत जनगणना की अपनी चुनौतियां होगीं, लेकिन उम्मीद की जा रही है कि यह जातिगत जनगणना भारतीय समाज में जाति के ताने-बाने और संसाधनों पर संख्या के अनुपात में हिस्सेदारी की देयता को मजबूत करेगी। हालांकि कई आवाज़े इस बात पर भी उठाई जा रही हैं कि जाति जनगणना से देश में सामाजिक एकता को नुकसान हो सकता है या फिर समाज में विघटन भी हो सकता है। लेकिन आजादी के 75 साल बाद भी जिस तरह भारतीय समाज में जातीय व्यवस्था जीवन के हर पहलू में मौजूद है और हमारे सामाजिक ताने-बाने में पहले की अपेक्षाकृत और भी गहराई से जड़े जमा चुकी है, ऐसे में जातिगत जनगणना और उसके परिणामों से समाज में आर्थिक और सामाजिक समानता लाने की कोशिश को बल मिलेगा ।
देश के संसाधनों, नौकरियों, आर्थिक उन्नति और बदलाव का लाभ समाज के सभी वर्गों को समान रूप से देने की दिशा में यह एक क्रांतिकारी कदम भी हो सकता है। हां, जरूरत होगी कि इस पूरी कवायद को बेहद सावधानी पूर्वक किया जाए और पूर्व में जो चुनौतियां जातिगत जनगणना में आई थी या जिस तरह के अनुभव हुए थे, उनसे सीख लेकर इस अनुभव को सकारात्मक बनाने की कोशिश की जाए। अगर हम इतिहास में झांकें तो इससे पहले ब्रिटिश शासन के तहत 1931 में जातिगत जनगणना करवाई गई थी । उस वक्त जातिगत जनगणना करने की जिम्मेदारी ब्रिटिश राज के सिविल सर्वेंट और मानव विज्ञानी (Anthropologist) जॉन हेनरी हटन (John Henry Hutton) को दी गई थी, जो ब्रिटिश सरकार द्वारा जनगणना आयुक्त नियुक्त किए गए थे। जॉन हटन का जन्म इंग्लैंड के योर्क शायर में हुआ था। उनकी पढ़ाई लिखाई और ट्रेनिंग ऑक्सफोर्ड में हुई थी। वे भारतीय सिविल सेवा के अधिकारी थे । उन्हें 1931 में सेंसस कमिश्नर नियुक्त किया गया था। हटन ने 1909 में भारतीय सिविल सर्विस ज्वाइन की थी।
1931 जातिगत जनगणना का इतिहास
जातिगत जनगणना करते समय मानव वैज्ञानिक होने का उनका अनुभव बेहद काम आया था। भारत में उन्होंने अपने करियर का लंंबा समय नगा हिल्स में बिताया था, जहां उन्होंने नगा एंथोग्राफी पर बड़े-बड़े मोनोग्राफ्स लिखे थे। एक एंथ्रोपॉलजिस्ट होने के नाते जातिगत जनगणना में उन्हें विशेषज्ञता हासिल थी। जाति गणना की जटिलताओं पर, उनकी जनगणना रिपोर्ट बहुत कुछ बताती है, जिसमें पूर्व जनगणना प्रमुख सर हर्बर्ट रिस्ले का उल्लेख है, जिन्होंने 1901 की जनगणना में सामाजिक पदानुक्रम के रूप में जाति व्यवस्था को रेखांकित किया था। जिसे बाद के सर्वेक्षणों और नीतियों का आधार बनाया गया।
Read this also: सौ साल बाद एक बार फिर होगी जातिगत जनगणना, फायदा या नुकसान !
जातियों की समाज में उनके रैंक के अनुसार एक सूची बनाने का प्रयास किया गया था। इस प्रयास पर हटन ने “Return of Caste” में लिखा था, “यह प्रयास पूरी तरह सफल नहीं था, क्योंकि प्रत्येक जनगणना अपने आप में अत्यधिक समस्याग्रस्त इतिहास के साथ होती है, जिसमें कुछ कथित तथ्य या परिकल्पना की मान्यता मांगी जाती है, जिसके बारे में जनगणना विभाग कानूनी रूप से निर्णय लेने में सक्षम नहीं है”। हटन ने जातिगत जनगणना के अनुभवों को काफी जटिल मानते हुए कहा था कि जाति के बारे में सही मालूमात हासिल करना और सही जवाब पाना और फिर जनगणना के लिहाज से उसकी व्याख्या करना बेहद ही मुश्किल भरा कार्य था।
जातिगत जनगणना की चुनौतियां
उनका अनुभव था कि जाति जनगणना का कार्य बहुत सी चुनौतियों से भरा हुआ था। जब लोगों से उनकी जाति के बारे में जानकारी ली जाती थी तो कई बार इसे गलत अर्थ में लिया जाता था और लोग जानकारी व डाटा एकत्र करने के इस कार्य में स्वयं को सामाजिक व्यवस्था में ऊंचे स्थान पर रखने की कोशिश करते थे। और कई बार इस कवायद में संख्या के लिहाज से मजबूत दिखाने या फिर सामाजिक व्यवस्था में अपना दावा बनाए रखने के लिए कई जातियां, एक जाति में भी कंसोलिडेटेड कर देनी पड़ी थी। उनकी रिपोर्ट में यह भी लिखा गया था कि उदाहरण के तौर पर जाति को एक समूह के रूप में सशक्त दिखाने के लिए कई जातियों का एक समूह बनाकर उसे एक जाति का नाम दे दिया गया था, जैसे कि अहीर, ग्वाला, गोपी, इदैया और दूध के व्यवसाय से जुड़ी हुई कुछ अन्य जातियों को ‘यादव’ नाम की एक जाति में समाहित कर दिया गया था।
उन्होंने एक और अनुभव का भी वर्णन किया, जहां पर “बढ़ई, लोहार, सुनार और इसी तरह के काम करने वाले कुछ और पेशों से जुड़े लोगों ने राष्ट्रीय स्तर पर एक समूह के रूप में स्वयं को एक पहचान देने की कोशिश की थी, जिसमें उन्हें विश्वकर्मा या जांगिड़ा कहलाने की पेशकश की गई थी और कोशिश यह थी कि वह वर्ण व्यवस्था में स्वयं को ब्राह्मण या राजपूत जैसी उच्च जातियों के समानांतर रख सकें। और यही बात ब्राह्मण और राजपूत जाति को भी लेकर भी कहीं जा सकती थी, जहां पर अलग-अलग प्रांतो में जो कहीं पर ब्राह्मण थे, वह राजपूत में स्वयं को गिनवा रहे थे और ऐसे भी कई प्रकरण देखे गए जहां 10 साल पहले जिन लोगों ने स्वयं को राजपूत जाति में गिनवाया था, वह स्वयं को ब्राह्मण गिनवाने लगे।”
जनगणना में इन प्रयासों को सामाजिक क्रम में ऊपर की ओर बढ़ने की कोशिश के रूप में देखा गया, या फिर राजनीतिक जीवन में प्रभाव पाने के लिए इसे बड़े समूह का समर्थन पाने के प्रयास के रूप में भी देखा गया।
जाति जनगणना की प्रासंगिकता
जाति गणना में आने वाली जटिलताओं के बावजूद हटन का एक एंथ्रोपॉलजिस्ट के रूप में मानना था कि इस जातिगत जनगणना के सामाजिक लाभ भी जरूर हैं और इसकी आलोचनाओं के बावजूद यह नहीं कहा जा सकता कि सिर्फ गणना मात्र से किसी सामाजिक व्यवस्था को कायम रखा जा सकता है, बल्कि इस गणना से समाज की वास्तविक स्थिति के करीब पहुंचा जा सकता है, उसकी स्थिति और आवश्यकताओं को समझा जा सकता है। उनका यह भी कहना था कि किसी भी व्यवस्था के प्रति आंख मूंद लेने से उससे छुटकारा नहीं पाया जा सकता। इस मायने में 1931 की जातिगत जनगणना कुछ हद तक भारतीय समाज में एकता और समानता लाने की एक महत्वपूर्ण कड़ी भी थी।
हटन की रिपोर्ट में आगे के लिए रोड मैप और चेतावनी
हटन की रिपोर्ट में दलित वर्गों की गिनती पर भारत सरकार के निर्देशों का उद्धरण दिया गया था। इन निर्देशों में आगे के लिए रोडमैप और पूर्वचेतावनी दोनों मौजूद हैं। 1931 की जनगणना कार्यों के विभिन्न अधिकारियों को यह निर्देश जारी किए गए थे कि “दलित वर्गों में शामिल करने के लिए जातियों की एक सूची बनाना आवश्यक होगा और सभी प्रांतों से लागू होने वाली सूची तैयार करने के लिए कहा गया। इस प्रकार की सूची तैयार करने में बहुत कठिनाइयाँ हैं। पूरे भारत के लिए दलित वर्गों की एक सूची तैयार करना बेहद मुश्किल भरा कार्य होगा। दलित वर्ग की ऐसी सूची बनाना जो सभी पर लागू हो, यह चुनौती पूर्ण कार्य होगा”।
भारतीय सामाजिक व्यवस्था में जाति व्यवस्था की जटिलताओं और जातिगत पेशे के साथ जातियों के सम्मिश्रण के चलते अपनी क्षेत्रीय विभिन्नताओं के साथ इन्हें एक वर्ग में समाहित करना भी उतनी ही बड़ी चुनौती थी।
Hutton ने कहा था कि “आने वाले समय में जनसांख्यिकीय डाटा एकत्र करने के लिए जाति और धर्म के अलावा भी कई अन्य कारक महत्वपूर्ण होंगे । उन्होंने माना था कि आने वाले समय में धर्म और जाति के स्थान पर व्यक्ति का पेशा यह तय करने के लिए एक महत्वपूर्ण आधार होगा, लेकिन अभी वह समय नहीं आया है। क्योंकि अभी जाति और धर्म ही सामाजिक संरचना का आधार है। क्योंकि सामाजिक जीवन में जातीय पहचान अभी भी बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन आने वाले समय में इसमें बदलाव हो सकता है।” हालांकि 100 साल बाद भी इस पर बहस हो सकती है कि भारत में जातीय पहचान कितनी धूमिल पड़ी है या कितनी और गहरी हुई है ! जिस तरह से मंडल कमीशन लागू होने के बाद और जाति आधारित क्षेत्रीय दलों के उत्थान के साथ ओबीसी राजनीति का भारत के अधिकांश हिस्सों पर प्रभाव रहा, उसे देखते हुए यह कहना मुश्किल है कि जातीय व्यवस्था का भारतीय समाज पर असर किन्हीं भी मायनो में कम हुआ हो।
Caste Census: 1931 में जाति जनगणना की चुनौतियों के बाद 1941 में भी जनगणना के समय जाति विवरण एकत्र किए गए थे, लेकिन इसे अंतिम सूची से हटा दिया गया था। हटन के उत्तराधिकारी एम वाई एम येट्स जो द्वितीय विश्व युद्ध के समय जनगणना आयुक्त बनाए गए थे, उन्होंने जातिगत जनगणना के बारे में लिखा था , “केंद्रीय उपक्रम के हिस्से के रूप में इस विशाल और महंगी गणना करने के लिए यह समय उपयुक्त नहीं है, और मैं डॉ. हटन के विचारों से सहमत हूं, जो 10 साल पहले इतनी सीमित वित्तीय स्थिति के कारण उन्होंने रखे थे। इसके अलावा भी कई क्षेत्रों के अहम डाटा जमा करना ज्यादा जरूरी है। ऐसे में इसका कोई औचित्य नहीं है कि इस डिटेल पर लाखों खर्च किए जाएं।”
देश आजाद होने के बाद 1951 में नए भारत के लिए जनगणना के समय प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने जातिगत जनगणना न करवाने का फैसला किया था, क्योंकि उस वक्त आजाद भारत समानता और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों पर आकार ले रहा था और ऐसे में जातिगत जनगणना को गैर जरूरी और विभाजनकारी माना गया था।
1931 के जनगणना आयुक्त हटन ने वापस इंग्लैंड चले जाने के बाद भारत में जातिगत जनगणना के अपने अनुभवों को एक पुस्तक की शक्ल दी थी। जिसका शीर्षक था कॉस्ट इन इंडिया (Caste in India) । यह किताब इस विषय पर प्रमाणिक स्रोत मानी जाती है। हटन भारतीय सिविल सेवा से 1936 में सेवानिवृत होकर ब्रिटेन वापस चले गए थे। जहां वे अध्ययन कार्य से जुड़े रहे। उन्हें कैम्ब्रिज में सोशल एंथ्रोपोलॉजी के विलियम वाइस चेयर के लिए चुना गया था, जो उस समय ब्रिटिश मानवविज्ञान में सबसे प्रतिष्ठित शैक्षणिक पदों में से एक था। मंडल आयोग द्वारा समाज और राजनीति में जाति की प्रमुखता को दोबारा परिभाषित करने से दो दशक पहले 23 मई 1968 को उनकी मृत्यु हो गई।
जाति जनगणना क्यों जरूरी है ?
भारत में जाति जनगणना एक महत्वपूर्ण विषय है, जिसमें विभिन्न जाति समूहों के जनसांख्यिकीय आंकड़े इकट्ठे किए जाना तर्क संगत और जरूरी है। ताकि समाज की संरचना और जनसंख्या के वितरण को समझा जा सके। यह आंकड़े असमानताओं की पहचान करने, सकारात्मक कार्रवाई के लिए नीतियां बनाने और सामाजिक समानता को बढ़ावा देने के लिए महत्वपूर्ण हैं। जाति जनगणना से उन क्षेत्रों की पहचान करने में मदद मिलेगी, जहां भेदभाव है, सामाजिक और आर्थिक विषमता है। जनगणना के परिणामों से इसे दूर करने के लिए कदम उठाए जा सकते हैं। यह हाशिए पर रह रहे समुदायों की विशिष्ट आवश्यकताओं के लिए लक्षित विकास कार्यक्रमों के निर्माण में सहायक होगा। सटीक आंकड़ें, कोटा पुनर्गठन और ओबीसी के भीतर उप-वर्गीकरण में मदद कर सकते हैं, ताकि संसाधनों, नौकरियों और लाभों का समान वितरण हो सके।
हाल ही में बिहार राज्य ने 2023 में एक जाति सर्वेक्षण किया है, जिसमें पता चला है कि ओबीसी+ईबीसी आबादी 63% है। तेलंगाना में भी जाति जनगणना का कार्य राज्य सरकार ने कर लिया है।