Braj ki Holi : संपूर्ण ब्रजमंडल में होलाष्टक का प्रारम्भ ही लड्डूमार होली से होता है। राधा के पिता वृषभानु जी बरसाने के राजा और नंदगांव के नंदराय जी में प्रगाढ़ मित्रता थी। राधा जी की मंगनी बचपन में नंद जी की पत्नी जसोदा जी के भाई रायन के साथ हो चुकी थी। इस तरह रिश्ते से राधा कृष्ण की मामी थी। रायन कंस का सेनापति होने से सदैव युद्ध में ही व्यस्त रहता था। वो स्वभाव से भी क्रूर था। इसलिये राधा जी उसके स्थान पर कृष्ण से प्रेम करती थीं। राधा वृषभानु की इकलौती पुत्री थीं इसलिये वह राधा से बहुत प्रेम करते थे।
बरसाने में शुरू हुई थी लड्डू मार होली
उन्हें भी कृष्ण अच्छे लगते थे इसलिये उन्होंने भी राधा के प्रेम को स्वीकार कर कृष्ण के साथ राधा का विवाह करने का मन बना लिया। उन्होंने होली मनाने के लिये नंदराय जी के पास नंदगांव निमंत्रण भेजा। नंद राय जी ने अपने पुरोहित पंडितों को अपना स्वीकृति पत्र देकर बरसाने भेजा। इस समाचार से बरसाने में खुशी की लहर दौड़ गई। वृषभानु जी ने पुरोहित और पंडितों का लड्डुओं से भरे थालों से स्वागत किया अभी वह सब लड्डू खा ही रहे थे की बरसाने की महिलायें गुलाल उड़ाती वहां पहुंच कर उन्हे गुलाल लगाने लगीं। उस समय उन पंडितों ने भी लड्डुओं की उन पर बारिश करते हुये उनका स्वागत किया और बतलाया कि कल नंदराय जी अपने दल बल सहित होली खेलने आयेंगे ।
राधा ने गोप ग्वालो और कृष्ण का लाठियों से किया था स्वागत
यह सुनकर राधा जी ने अपनी सभी सखियों को बुला कर कहा कि कल हम लोग लाठियों से श्रीकृष्ण और उनके साथी गोपग्वालों का स्वागत करेंगे। यह था लट्ठ मार होली का रहस्य जो कि आज भी वहाँ बड़ी शान और जोर शोर से मनाई जाती है।
लट्ठ मार होली :-
ब्रजमंडल की सबसे प्रसिद्ध अपने आप में अद्भुत है लट्ठमार होली। गोप ग्वालों और श्री कृष्ण द्वारा राधा जी और उनकी सखियों के साथ छेड़खानी करने का मजा चखाने के लिये उन्हें भगाने के उद्देश्य से इसका आयोजन किया गया था। वाह रे कृष्ण और उनका अद्भुत प्रेम, लट्ठों की मार भी जिन्हें फूल की छड़ी जैसी लगी। उन सभी ने अपने सिरों पर बड़ी भारी पगड़ियां पहन रखीं थीं और हाथ में भोजन के लिये परोसी हुई थालियां ढाल का काम कर रहीं थी। अंत में जब सभी थक गई तो श्री कृष्ण ने गीत संगीत के माध्यम से अपने प्रेम का इजहार करते हुये उन सभी को होली खेलने नंदगांव आने का निमंत्रण दिया। इस तरह यह होली निरंतर कई दिनों तक अलग अलग रूपों में अलग अलग स्थानों पर मनाई गई। जिसकी परम्परा का निर्वहन आज भी हो रहा है ।
उषा सक्सेना
डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारी सामान्य संदर्भ के लिए है और इसका उद्देश्य किसी धार्मिक या सांस्कृतिक मान्यता को ठेस पहुँचाना नहीं है। पाठक कृपया अपनी विवेकपूर्ण समझ और परामर्श से कार्य करें