Ashadh Month 2025 : आषाढ़ माह, ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा के समाप्त होते ही प्रारम्भ हो जाता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार चतुर्थ आषाढ़ जिसका अर्थ आस को पूरण करने वाला महीना है। ये ग्रीष्म ऋतु का समापन और वर्षा ऋतु के प्रारम्भ का सन्धि काल होता है। सूर्यदेव के भीषण ताप से संतप्त हुई शुष्क तृषित धरा की प्यास बुझाने के लिये मेघों को आमंत्रित करने वाला महत्वपूर्ण महीना।
उषा सक्सेना
तभी तो कवि मन पुकार उठता है -,
ओ! आषाढ़ के पहले बादल ,
आओ! प्यासी धरती को सरसाओ ।
और तब निरभ्र आकाश के पटल पर घिर रहे श्यामल धुंध धुँआरे बादल अनेक चित्रों का चित्रांकन करते चारों दिशाओं से घिरने लगते हैं अपने इस आवाहन पर बरसने के लिये । तप के ताप से तापित धरती को सरस होकर सजल करते हुये उनके प्रेम की रस धार बरसने लगती है । बरखा की बूंदों में अनूठा है, आकाश का धरती से प्रेम जो दूर होकर भी उसके हित की चिंता करता है।
आषाढ़ मास केवल वर्षा ऋतु के प्राकृतिक रूप से आगमन का स्वागत ही नहीं करता वरन् इसके साथ ही इसका धार्मिक और सामाजिक रूप से सांस्कृतिक महत्व भी है । प्रथम चैत्र मास शक्ति की अवधारिणी माँ दुर्गा को समर्पित है ।दूसरा वैसाख का महीना भगवान विष्णु को । तीसरा ज्येष्ठ माह देवताओं में ज्येष्ठ ब्रह्मा को समर्पित होने के बाद संसार के पालन हार भगवान विष्णु के देवशयनी एकादशी से शयन में योग निद्रा में जाते ही यह माह देवाधिदेव महादेव को समर्पित हो जाता है ।
प्राकृतिक महत्व :-प्राकृतिक रूप से प्रकृति को नव जीवन देकर शुष्क धरा को सजल करते हुये हरी-भरी हरियाली से श्रृंगारित करने वाला माह है। कृषक के लिये खेतों में जुताई के बाद बुआई करने का महीना होता है।
धार्मिक महत्व:- शादी विवाह और धार्मिक कृत्यों के लिये अंतिम माह होता है । इसमें गुप्त नवरात्रि का अपना महत्व है। माना जाता है कि भगवान विष्णु का चार महीने चातुर्मास के लिये योगनिद्रा में जाकर पाताल लोक में दैत्यराज बलि के प्रहरी बन कर उनकी जल के भयंकर जीव जंतुओं से रक्षा करते हैं ।
व्रत उपवास:- अब से शिव का पूजन व्रत और उपवास प्रारम्भ हो जाता है । ग्रीष्म और वर्षा ऋतु का संधिकाल होने से इस समय भीषण गर्मी और उमस रहती है । पानी बरसते ही सूर्य के भीषण ताप से शुष्क धरातल से गरम और शीतल दोनों के संयोग से उठती वाष्प से उस समय उमस का वातावरण निर्मित होने लगता है जिसका प्रभाव हमारी पाचन क्रिया पर पड़ता है । इसलिये इस समय व्रत और उपवास का विधान है ।
सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व :- गर्मी के बाद पानी की बूंदें पड़ते ही मन मयूर नाच उठता है विभोर होकर गीत गाता बारिश की बूंदों में भीगता चल देता है। सामूहिक रूप से किसी अच्छे धार्मिक स्थान पर। देवस्थान पर पूजन अर्चन के बाद सामूहिक भोजन का अपना आनंद होता है । गांव में बरसात होते ही अषाढ़ माह में घर से बाहर जाकर गाकड़ और भटे का भरता अथवा दालबाटी बनाकर खाने का रिवाज अब भी प्रचलित है । जबकि महानगर हमारी इन सांस्कृतिक विरासत से दूर हो गये हैं। आषाढ़ मास इस वर्ष 12 जून से प्रारंभ हो गया है । आईये हम सब आषाढ़ मास का, सभी की इच्छायें मनोकामनाएं पूरा करने वाले इस माह का जिसका प्रारम्भ ज्येष्ठा नक्षत्र की समाप्ति के बाद आषाढ़ नक्षत्र से होता है का स्वागत करते हुये उसके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करें ।